देवनागरी लिपि – विशेषताएं, विकास क्रम और  मानकीकरण

किसी भी भाषा की लिपि जानने से पहले भाषा को जानना बहुत जरूरी है। यूँ तो भाषा को विचारों की संवाहिका, संस्कृति की अभिव्यक्ति तथा संप्रेषण का माध्यम माना जाता है। भाषा की यह परिभाषा साहित्यिक है, जबकि इसके वैज्ञानिक स्वरूप को यदि देखें तो भाषा मानव के उच्चारण अवयवों द्वारा उच्चरित ध्वनि प्रतीकों की सार्थक व्यवस्था है।

यह ध्वनि प्रतीक मुख्यतः मौखिक होते हैं तथा भाषा के श्रवण एवं भाषण कौशल से संबंधित होते हैं। जब इन्हीं मौखिक ध्वनि प्रतीकों को दृश्य प्रतीकों में परिवर्तित कर दिया जाता है और इन्हें लिखित चिह्नों का रूप प्रदान कर दिया जाता है तो यह लिपि का रूप धारण कर लेते हैं।

लिपि की परिभाषा

लिपि किसी भी भाषा के ध्वनि प्रतीकों की लिखित व्यवस्था होती है, जिसे हम भाषा के दृश्य प्रतीक के रूप में जानते हैं और जो भाषा के वाचन और लेखन कौशल से सम्बद्ध होती है। भाषा को हम दो रूपों में जानते हैं:

पहला मौखिक दूसरा लिखित, भाषा का लिखित रूप ही लिपि है जो ध्वनियों को अंकित करने के लिए प्रयोग में लाई जाती है। दूसरी परिभाषा के अनुसार भाषा के लिखित संकेतों और दृश्य प्रतीकों को लिपि कहते हैं।

देवनागरी लिपि का विकास

भारत के संविधान में देवनागरी लिपि का स्थान राजभाषा हिंदी की लिपि के रूप में किया गया है। देवनागरी लिपि का उद्भव बाह्मी लिपि से हुआ है। कहते हैं कि ब्राह्मी लिपि से उत्तरी शैली का विकास हुआ, उत्तरी शैली से प्राचीन नागरी का विकास हुआ, प्राचनी नागरी से पश्चिमी नागरी का विकास हुआ एवं तदनन्तर पश्चिमी नागरी से देवनागरी का विकास हुआ।

ब्राह्मी लिपि – उत्तरी शैली – प्राचीन नागरी – पश्चिमी नागरी – देवनागरी

देवनागरी लिपि चार भाषाओं में लिखी जाती है संस्कृत, हिंदी, मराठी और नेपाली इस लिपि का स्वरूप भारत में नौवीं शताब्दी से पहले ही निर्धारित हो गया था और इसके चिह्न समय के साथ-साथ धीरे धीरे परिवर्तित होते रहे। दसवीं शताब्दी में आकर देवनागरी लिपि के चिह्नों में काफी स्थिरता आने लगी। ग्यारहवी शताब्दी की नागरी लिपि आज की नागरी लिपि से काफी मिलती-जुलती हैं। बारहवी शताब्दी तक आते-आते देवनागरी लिपि के चिह्नों का स्वरूप काफी हद तक स्थिर हो गया और आज के अधिकतम लिपिवर्ण बारहवीं शताब्दी के अनुसार पाए जाते है।

देवनागरी लिपि के विकास क्रम की कुछ मुख्य बातें इस प्रकार हैं

1 शून्य (0) का अंक देवनागरी लिपि द्वारा ही विकसित किया गया है।

2- कालान्तर में ड़ ,ढ़ श्र  ध्वनियों का विकास इसमें हुआ।

3- देवनागरी लिपि की मुख्य विशेषता उसके वर्णों में शिरोरेखा का प्रयोग है।

देवनागरी लिपि की विशेषताएं

1. विश्व की लिपियों की तुलना में सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है। यह अक्षर आधारित लिपि है। देवनागरी का उपयोग तार, टेलीप्रिंटर, टंकण, मुद्रण, कंप्यूटर क्षेत्रों में सुगमता से किया जा सकता है।

2. यह विश्व की प्राचीनतम लिपि है।

3. एक ध्वनि के लिए एक वर्ण है क ख ग घ जबकि उर्दू में ‘अ’ के लिए अलिफ व एन दो वर्ण है। रोमन में ‘क’ के लिए ‘C’ ‘kq’

4. एक वर्ण एक ही ध्वनि को व्यक्त करता है क क ध्वनि को ही व्यक्त करता है। जबकि अंग्रेजी

का ‘u’ – ‘put’, ‘butbusy, rude

3      अ        इ      ऊं  ——– की उच्चारित करता है।

5. स्वरों के लिए अलग वर्ण एवं उनकी मात्राओं के लिए अलग वर्ण है जबक्ति रोमन फारसी में

मात्राओं के लिए अलग से कोई चिह्न नहीं है।

6. स्वर सहित व्यंजन का उच्चारण क + अ = क, जबकि रोमन तथा फारसी में स्वरों को अलग से व्यंजनों के साथ लिखना पड़ता है।

7. वर्णमाला में स्वरों एवं व्यंजनों का एक व्यवस्थित क्रम है। पहले स्वर फिर व्यंजन .

8. लेखन और उच्चारण में एकरूपता है जबकि रोमन में साइक्लोजी को psychology तथा निमोनिया को      Pneumonia लिखा जाता है जो उच्चारण के अनुरूप नहीं है।

9. देवनागरी लिपि में छोटे-बड़े वर्ण नहीं होते, उनकी आकृति प्रायः बराबर होती है। रोमन लिपि में कोई           वर्ण ऊपर लिखा जाता है तो कोई नीचे लिखा जाता है अर्थात् small एवं Capital letter होते हैं।

10. ध्वन्यात्मक लिपि है हर व्यंजन में स्वर मिला रहता है जैसे प + अ जबकि रोमन लिपि में स्वरों को                 अलग से लिखना होता है।

11. यदि किसी व्यंजन को स्वर रहित दिखाना होता है तो प्रायः हलन्त चिह्न लगाया जाता है।

12. आगत ध्वनियों के लिए अलग वर्ण विकसित किए गए हैं ।

13. देवनागरी लिपि में एक वैज्ञानिक क्रमवद्धता होती है। पहले हस्व स्वर फिर दीर्घ स्वर उसी प्रकार पहले असंयुक्त व्यंजन बाद में संयुक्त व्यंजन इस तरह का क्रम है। वर्ण ध्वनियों के उच्चारण स्थान को ध्यान में रखकर पंक्तिबद्ध बैठाए गए हैं जैसे ध्वनियाँ कंठ्य से शुरू होकर ओष्ठ तक सम्पन्न होती हैं।

14. देवनागरी लिपि में प्रत्येक वर्ण का उच्चारण होता है। संसार की अन्य लिपियों में ऐसा नहीं है जैसे calf का उच्चारण काफ होता है। इसमें L ध्वनि का उच्चारण नहीं होता।

15. देवनागरी लिपि में सभी स्वर और व्यंजन के लिए अलग-अलग हस्व और दीर्घ चिह्न हैं। तुलनात्मक दृष्टि से रोमन लिपि में ध्वनि चिहनों की अनेकरूपता है। देवनागरी लिपि अक्षरात्मक एवं वर्णनात्मक दोनों है। देवनागरी लिपि वर्ण विभाजन की दृष्टि से वैज्ञानिक हैं। अघोष और सघोष तथा अल्पप्राण तथा महाप्राण की दृष्टि से इस लिपि की अपनी वैज्ञानिकता

देवनागरी लिपि के दोष :

1- ध्वनि है किन्तु वर्ण नहीं जैसे: न्ह, म्ह ह

2 वर्ण हैं किन्तु ध्वनि नहीं ” रि

3- संयुक्त व्यंजन (श+र) ज्ञ (ज +य) उच्चारण ग्य, त्र ( त + र) क्ष (क् + श)

4- इ की मात्रा “इन्द्रिया’ देखने में उच्चारण में दि के साथ, लिखने में इ+न्द्+र+इ+ऑ

5- कुछ वर्ण एक वर्ण न होकर संयुक्त व्यंजन है जैसे क्ष त्र ज्ञ

6- कुछ वर्ण निरर्थक है जैसे अ

7- टंकण मुद्रण में जटिल है।

8- शिरोरेखा होने से तेजी से लिखने में कठिनाई होती है।

देवनागरी लिपि का मानकीकरण

लिपि के मानकीकरण से तात्पर्य है लिपि के वर्णों को लिखने में एकरूपता लाना ताकिसभी के लिए बोधगम्य और सम्प्रेषणशील हो सके। देवनागरी लिपि का मानकीकरण चार रूपों किया गया है जो इस प्रकार है:

संयुक्त जनों मानकीकरण करते समय खड़ी पाई वाले व्यजनों की खड़ी पाई हटा दीजाती है उसे अप्पू, कच्चा, तथा ऐसे वर्ण जिनमें हुक होता है उनको संयुक्त अक्षर के रूप में प्रकसमय उनका हुक हटा दिया जाता है जैसे पक्का।

  • इसके अतिरिक्त ट वर्ग व्यंजनों का संयुक्त अक्षर के रूप में प्रयोग करते समय उनमें हलत लगा दिया जाता है जैसे संयुक्त का प्रयोग पूर्वानुसार तीन रूपों में होता है उदाहरणार्थ – राष्ट्र , भद्रा  आदि।
  • समवर्गीययुक्त अक्षरों में पंचमाक्षरों को संयुक्त व्यंजन के ऊपर बिंदु लगाकर प्रयोग किया जाता है पंखा, हिंदी, संत असमवर्गीय वर्गोचमाक्षर का प्रयोग होता है उदाहरणार्थ: वाड्मय, अन्तषण, अन्य
  • संयुक्ताक्षर में एक वर्ण दो बार प्रयुक्त होने पर उसकी खड़ी पाई हटा दी जाती है उदाहरणार्थ अन्न, सम्मेलन अनुनासिक का प्रयोग उन वर्गों के साथ होता है जिसमें शिरोरखा रेखा के ऊपर कोई मात्रा नहीं लगती।

 देवनागरी लिपि के वर्णों का क्रम

  • विश्व की भाषकी लिपि में प्रयोग होने वाले वर्णों का एक क्रम होता है जैस ए बी सी डी उसी प्रकार देवनागरी लिपे में भी वर्णों का एक क्रम निर्धारित है। जिसकी मुख्य विशेषताएं इस प्रकार है पहले और उसके बाद व्यंजन लिखे जाते हैं।
  • स्वर में भी पहले और फिर दीर्घ स्वर दिये जाते हैं। कालान्तर में विकसित नए स्वर को स्वरों के दल में के बाद स्थान दिया गया है। इसी प्रकार ‘ड’ कोड के बाद तथा ढ के बाद इ को स्थान है।
  • आगत वर्णाको माला में सबसे अन्त में स्थान दिया गया है जैसे –  क  ख़   ग़   ज़   फ़ आदि।
  • वर्ण संख्या हर लिपि की वर्ण संख्या निर्धारित होती है उसी प्रकार देवनागरी लिपि के वर्षों की भी संख्या निर्धारित है जो इस प्रकार है स्वर 11 व्यंजन 36 तथा 5 आगत व्यंजन है।

वर्णों का उच्चारण

वर्णों का उच्चारण कई बार लिपि में हम लिखते कुछ हैं और बोलत कुछ और हैं जैसे: गये, आये, इसका उच्चारण सरल और स्वभाविक करने के उद्देश्य से अब इन शब्दों का रूप बदल कर गए, आए कर दिया गया है।

मानकीकरण का महत्व

1 मानकीकरण एक प्रक्रिया है जिसकी सहायता से लिपि की विभिन्नता में एकरूपता लाई जाती है।

2 मानकीकरण से भाषा स्तरीय हो जाती है। ॐ संप्रेषण में लिपि का प्रयोग अधिक सरल एवं बोधगम्य हो जाता है।

4- लिपि का संबंध लेखन (भाव) तथा पठन (भाव ग्रहण) से हैं।

5- टाइपराईटर, कम्प्यूटर, मुद्रण तथा आधुनिक यंत्रों में लिपि की एकरूपता आती है।

6 मानक लिपि भाषा में स्थायित्व लाती है।

7. शब्दों का उच्चारण कुछ भी हो वर्तनी की एकरूपता उसको अन्य भाषाओं में प्रतिष्ठा दिलाती है।

8 भाषा के विकास में सहायक होती है।

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महत्वपूर्ण प्रश्न और उसके उत्तर :-

प्रश्न 1- देवनागरी लिपि के गुण एवं दोषों को स्पष्ट करते हुए वैज्ञानिकता पर प्रकाश डालिए ?

उत्तर – देवनागरी लिपि के गुण-दोष तथा उसकी वैज्ञानिकता – दुनियाकी कोई भी वस्तु सभी दृष्टियों से पूर्ण नहीं होती । इसी प्रकार देवनागरी लिपि में भी गुण और दोष दोनों ही हैं। देवनागरी लिपि के इन गुण और दोषों पर निम्न रूप में प्रकाश डाला आ रहा है।

i.लिपिचिहनों के नाम ध्वनियों के अनुरूप :

देवनागरी लिपि का यह बहुत बड़ा गुण है कि देवनागरी लिपि का जो लिपिचिह्नजिस ध्वनि का छ्‌योतक है, उसका नाम भी वही है। देवनागरी लिपि की सर्व प्रमुख विशेषता है कि “यथा उच्चरते तथा लिख्यते । यथा लिख्यते तथैव पठ्‌यते ॥” अर्थात इसमें वर्ण अंकन दवनि के अनुसार ही होता है। “जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा जाता है तथा जैसा लिखा जाता है वैसा ही पढ़ा जाता है।” यह विशेषता देवनागरी लिपि के अतिरिक्त अन्य किसी लिपि में नहीं है। इसीलिए देवनागरी लिपि को सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि माना गया है।

इसी प्रकार उर्दू में भी कुछ का कुछ पढ़े जाने की संभावना बनी रहती है। इस बात को इस उदाहरण की सहायता से स्पष्ट किया जा सकता है – “ अब्बा अजमेर गए।” को उर्दू में लिखने पर इस तरह भी पढ़ा जा सकता है- “अब्बा आज मर गए। ” देवनागरी लिपि में इस प्रकार की असंगतियाँ होने की गुंजाइश या संभावना नहीं है।

ii.एक ध्वनि के लिए एक लिपि चिह्न :

देवनागरी लिपि की यह भी प्रमुख विशेषता है कि इसमें एक ध्वनि के लिए एक ही लिपिचिहन है, एक से अधिक नहीं है। देवनागरी लिपि के अलावा रोमन लिखि में ऐसा नहीं है। रोमन लिपि में तो एक ध्वनि के लिए कई-कई लिपि चिह्नों का प्रयोग होता है, जैसे Kite में k, Coat में c…..

iii.एक लिपिचिहन से एक ही ध्वनि की अभिव्यक्ति :

देवनागरी लिपि का यह भी प्रमुख गुण है कि इसके एक लिपिचिह्न से केवल एक ही ध्वनि की अभिव्यक्ति होती है। देवनागरी लिपि में रोमन लिपि की तरह C से ‘स’ तथा ‘क’ का तथा g से ‘ गा ‘ तथा जा’ का भ्रम  नहीं होता है। यही कारण है कि अंग्रेजी भाषा में उच्चारण सिखाना पड़ता है तथा याद करना पड़ता है, जैसे- Put-पुढं, But = बट, ct कैटे| Cat = कैट तथा Pam पैन आदि।

iv.लिपिचिहनों की पर्याप्तता

देवनागरी लिपि आधारिक लिपि है। लिपिचिट्‌नों की पर्याप्तता की दृष्टि से देवनागरी लिपि संपन्न व समृद्ध है। देवनागरी लिपि में 10 स्वर, 33 व्यंजन, अनुस्वार ।” अनुनासिक तथा विसर्ग चिह्नों के होने के कारण संसार की सभी भाषाओं की छानियों को लिपिबद्ध करने की क्षमता देवनागरी लिपि में है। जबकि रोमन लिपि में अंग्रेजी की यह ध्वनियों के लिए केबल 26 लिपिचिह्नों से ही काम चलाना पड़ता है। देवनागरी लिपि के व्यंजन सात वर्गों में विभाजित है-

1) कंट्य 2) तालव्य (3) मूर्धन्य दव्य (4) ओष्ठ्य (5) अर्धस्वर (6) ऊष्म तथा (7)अंतस्थ व्यंजन | देवनागरी लिपि में 10 स्वर T अनुस्वार तथा विसर्ग के 12 लिपि चिह्नों से बारह खड़ी तैयार की जाती है।

व्यंजनों में श’ और ‘ष’ के स्थान पर मध्यकाल में केवल प्रयोग होता था, किंतु अब श, प, स तीनों ही लिपिचिह्नों की प्रयोग होता है।

हिंदी में अनुस्वार के अतिरिक्त अनुनासिक ध्वनि भी आग है जिसके लिए अचंद्र बिंदु, लिपि चिह्न का प्रयोग अक्षर के रूप में होता है।

अरबी-फारसी की अलिजिहवीय ध्वनियों के छ, ख, ग नीचे नुक्ता लगाकर प्रयोग होता है। संघषध्विनियों के लिए ज और फा के नीचे नुक्तालगाकर न और फ़ लिखा जाता है। इसलिए देवनागरी लिपि में लिपि चिह्नों की पर्याप्तता है।

v.हस्व तथा दीर्घ स्वर के लिए स्वतंत्र लिपि चिन्ह  :

हिंदी के स्वरों “का भेद है । इन स्वरों की अपनी अपनी में ह्रस्व तथा दीर्घ मात्राएँ भी निश्चित हैं। हिंदी के ह्रस्व स्वरों तथा दीर्घ स्वरों के लिए देवनागरी लिपि में अलग-अलग स्वतंत्र लिपिचिह्न हैं। इस दृष्टि से रोमन लिपि और देव नागरी लिपि में कोई समानता नहीं है।

रोमन लिपि में ए (A) लिपिचिह्न से ‘अ’ का भी काम लेते हैं तथा आ’ का भी काम लेते हैं, जैसे- Kam-कम भी है और काम भी है। Kala – कला भी है तथा काला भी है। इसी तरह से u  उ भी है तथा ऊ भी है

जबकि देवनागरी लिपि में अ-आ, ह्रस्व तथा दीर्घ का स्पष्ट अंतर है। इसलिए देवनागरी लिपि में रोमन लिपि की तरह भ्रम की गुंजाइश नहीं है।

vi. देवनागरी लिपि में लेखन और उच्चारण में समानता :

देवनागरी लिपि की यह विशेषता है कि देवनागरी लिपि में लेखन और उच्चारण में एक रूपता है जबकि रोमन लिपि में साइकोलोजोगी psychology न्यूमोनिया (निमोनिया ) को Pneumonia, कर्नल को colonel तथा लेफ्टीनेंट को Lieutenant लिखा जाता है, जो कि उच्चारण के अनुरूप नहीं है ।

vii.देवनागरी लिपि में लिपिचिह्नों की आकृति की समानता :

देवनागरी रोप में बिपिचिछन् आकार में छोटे या बड़े नहीं होते, उनके आकृति प्राय: बराबर होती है, जबकि रोमन लिपि में कोई चिपचिह्न (वणे) ऊपर लिखा जाता है, तो कोई नीचे लिखा जाता है। रोमन लिपि में capital Letters आकृति की दृष्टि से समान होते हैं,

small  letters  आकृति की दृस्टि से समान नहीं होते हैं ।कोई वर्ण छोटा होता है, तो कोई वर्ण काफी छोटा तथा कोई वर्ष काफी बड़ा होता है, जैसे d,i,e,c, f, आदि।

viii.मात्राओं का प्रयोग :

देवनागरी लिपि में यदि स्वर स्वतंत्र रूप में आते हैं, तो पूरे लिपिचिह्न (वर्ग) का प्रयोग होता है; आग, ईद, गाउन आदि। लेकिन व्यंजन के साथ अ कर अन्य सभी स्वरों का मागावाला रूप प्रयुक्त होता है, जैसे नाग, सीख, चतुर, मूर्ख, दिन, नोट, चौकी आदि देिवनागरी लिपि में यदि मात्राओं का प्रयोग नहीं होता। रोमन लिपि की तुलना में भी इससे प्राय: स्थान कम ही घिरता है, जैसे काला = Kala, बाबू = Baboo आदि। लेकिन देव नागरी वि में ऊपर-नीचे मात्रा के कारण कुछ असुविधा अवश्य होती है। ? देवनागरी लिपि में अल्प प्राण तथा महाप्राण व्यंजन छानियों की लिखने के लिए अलग-अलग लिपि चिह्न हैं।

ix.देवनागरी लिपि में ध्वनियों का क्रम वैज्ञानिक है :

देवनागरी लिपि में छानियों का क्रम वैज्ञानिक है, जैसे- स्पर्शध्वनियाँ कंठ से आरंभ होकर होठ तक आती हैं। प्रत्येक वर्ग में अल्प प्राण ध्वनि के बाद महाप्राण ध्वनि आती है तथा प्रत्येक (व्यंजन) वर्ग के पहले दो वर्ण अघोष है तथा तीसरे और चौथे वर्ण सघोष हैं। प्रत्येक वर्ग की नासिक्य ध्वनियाँ अंत में (पाँचवें क्रम पर दी गई है।

देवनागरी लिपि में इन गुणों अथवा विशेषताओं के होते हुए भी कुछ कमियाँ अथवा दोष भी है। संयुक्त के लिए अनुस्वार का प्रयोग होता है, जैसे- गङ्गा = गंगा, चञ्चल चंचल आदि। देवनागरी लिपि मात्राओं की दृस्टि से जटिल है क्योंकि देवनागरी लिपि में मात्राएँ या तो शिरोरेखा के ऊपर अथवा वर्ण के नीचे या वर्ण के आगे-पीछे लगने के कारण लेखन, टंकण तथा मुद्रण आदि जटिल है।

वैज्ञानिक एक लिपि के गुण और वैज्ञानिकला की कसौटी पर देवनागरी –

विश्व की कोई लिपि सभी दृष्टियों से वैज्ञानिक लिपि नहीं है, लेकिन पूर्णतः पूर्णत: वैज्ञानिक लिपि की कल्पना की जा सकती है या उसके गुण गिनाए जा सकते हैं । वैिज्ञानिक लिपि को वर्णनात्मक होना चाहिए, आक्षरिक नहीं । अर्थात् उसके लिपिचिन भाषा में प्रयुक्त प्रत्येक स्वर तथा प्रत्येक व्यंजन के लिए अलग-अलग होने चाहिए । उल्लेखनीय है कि देवनागरी लिखि में

क, ख, ग, घ आदि व्यंजनों (लिपिचिह्नों में व्यंजन तथा स्वर मिलले हुए हैं अर्थात देवनागरी लिपि वर्णनात्मक नहीं आारिक लिपि है। -) वैज्ञानिक लिपि में भाषा विशेष में प्रयुक्त प्रत्येक ध्वनि के लिए बिधि चिह्न होने चाहिए | देवनागरी लिपि में दैल्योष्ट्य व’ के लिए लिपिचिह्न नहीं है।

वैज्ञानिक लिपि में एक लिपिचिह्न से एक ध्वनि ही व्यक्त होती चाहिए, एकाधिक ध्वनियों नहीं। देवनागरी लिपि में ‘व’ से दो T ध्वनियाँ व्यक्त होती हैं। इसी प्रकार वैज्ञानिक लिपि में एक ध्वनि के लिए एक ही लिपिचिह्न होना चाहिए, जबकि देवनागरी लिपि में एक ही दबाने के लिए रि, ऋ, श, ष आदि लिपिचिह्न आज भी है।

देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता के संबंध में कहा जा सकता है। यह लिपि विश्व की सभी लिपियों से अच्छी है, वैज्ञानिक है तथा पूर्ण है। यद्यपि इसमें कुछ कमियाँ भी हैं। देवनागरी लिपि में सुधार के प्रयास : अपनी उपर्युक्त विशेषताओं के बाद भी देवनागरी लिपि पूर्णतः वैज्ञानिक लिपि नहीं है।

  • इसे वैज्ञानिक बनाने के लिए तथा टंकण, मुद्रण आदि की व्यावहारिक कठिनाइयों को दूर करने के लिए उसमें कुछ सुधारों की आवश्यकता है। देवनागरी लिपि के सुधार के लिए कुछ प्रमुख सुझाव इस प्रकार है देवनागरी लिपि में एक ही ध्वनि के लिए एकाधिक लिपिचिहन है, जैसे- र, आदि, ल-लका, श-ष, अन्न तथाण-सा आदि। इसमें से र, हा, श, अलथापा को लेकर शेष को छोड़ देने पर यह कभी दूर की जा सकती है।
  • वैज्ञानिक लिपि में वर्ण उसी क्रम में लिखे जाने चाहिए जिस क्रम में से बोले जाएँ । देवनागरी लिपि में यों तो उ ऊ ऋ ए, ऐ की मात्राएँ भी इस दृष्टि से अवैज्ञानिक है। क्योंकि वे दाई ओर न दी जाकर ऊपर-नीचे दी जाती है, लेकिन यदि इन्हें छोड़ भी दें तो कम-से-कम इ की मात्रा हो अवश्य ही परिवर्तित होनी चाहिए, क्योंकि यह अपने स्थान से कभी एक, कभी दो और  कभी-कभी तो तीन स्थान पहले तक लिखी जाती है, जैसे कि, प्रिय , चन्द्रिका आदि।

इसके लिए कई सुझाव सामने आए जैसे, प्रयुक्त इ, ई दोनों को लिखना, अंतर के लिए इ’ के लिए की खड़ी पाई को छोटा कर देना चाहिए । इसमें से किसी के भी माना जा सकता है। र’ के संबंध में भी ऐसी ही गड़बड़ी है, जैसे- क्रम कर्म, राष्ट्र आदि। इसके लिए र’ को ले लेना चाहिए तथा शेष को छोड़ देना चाहिए ।

  • देवनागरी लिपि में संयुक्त व्यंजन, स्वतंत्र अक्षर जैसे हैं, जैसे ? (श्र, क्ष, त्र, ज्ञ) इन्हें छोड़कर ‘२२’ आदि रूपों में संयुक्त व्यंजन वर्ण लिखे जा सकते हैं।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि देवनागरी लिपि में जितनी सूक्ष्म वैज्ञानिकता का आधार रखा गया है, उतना विश्व की किसी लिपि में नहीं है। इसमें इतनी सूक्ष्म बातों का ध्यान रखा है कि कोई भी गड़बड़ी होने की गुंजाइश नहीं रहने दी है। या कुछ विद्वानों में इस लिपि के कुछ दोषों हम शिनाय है और उनके सुधार के लिए भी समय-समय पर सुझाव एवं प्रस्ताव आते रहे हैं।

वास्तव में देवनागरी लिपि में कोई कमी नहीं है। यों उसके लिखने कुछ गलतियाँ भ्रम के कारण करने लगें या कुछ उच्चारण लुप्त है लगें, तो इसमें लिपि का कोई दोष नहीं है। इसमें उच्चारण की स ध्वनियों की विभिन्नता, वर्णानुरूप आकृतिमूलकता, अनुनागरी ध्वनियों में सूक्ष्मता आदि ऐसे गुण हैं जिनके कारण को पूर्ण वैज्ञानिक लिपि कहा जा सकता है ।

प्रश्न 2- देवनागरी लिपि की उत्पति उसके विकास का इतिहास बताइए?

उत्तर :- देवनागरी लिपि की उत्पत्ति, स्वरूप एवं विकास : से तात्पर्य लिपि लिखित ध्वनि प्रतीकों की उस व्यवस्था है, जिसकेद्वारा भाषा के वाचिक रूपको रूपायित किया जा सके।

राजभाषा भारत के संविधान में देवनागरी लिपि का स्थान हिंदी की लिपि के रूप में दिया गया है। भारत की भाषाओं में से हिंदी, संस्कृत, मराठी तथा नेपाली भाषाएँ देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। भारत में लिपि  का प्रचार कब हुआ और उसका मूल स्रोत क्या था ? इसे लेकर विद्वानों में मतभेद है।

अधिकांश यूरोपीय विद्वान यह मानते रहे हैं कि लिपि का विकास और प्रयोग भारत की अपनी चीज नहीं है, किंतु वास्तविकता इसके विपरीत है। हमारे यहाँ पाणिनि अष्टाध्यायी में लिपि और लिपिकर आदि शब्द है जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके समय पांचवीं दी ई० पूलक लिखने का प्रचार अवश्य हो गया था। इसके अतिरिक्त भाषा के व्याकरणिक विश्लेषण की जो हमारी समृद्ध परंपरा मिलती है, वह भी लेखन के बिना संभव नहीं ।

भारत में प्राचीन दो लिपियाँ मिलती है तथा खरोष्ठी लिथि । इनमें खरोष्ठी लिखि सो विदेशी लिपि थी, जिसका प्रचार पश्चिमोत्तर प्रदेश में था और ओ उर्दू लिपि की तरह दाई ओर से बाईं ओर के लिखी जाती थी।

नागरी शब्द की उत्पत्ति :

यह नागरी नाम कैसे पड़ा ? इस संबंध में काफी विवाद है। इस संबंध में कुछ मत प्रकार हैं

  • इस गुजरात के नागर ब्राह्मणों द्वारा विशेष रूप प्रयुक्त होने के कारण यह नागरी कहलाई ।
  • कुछ विद्वान ‘नागर’ शब्द से इसका संबंध जोड़कर इसका अर्थ नागरी लगाते हैं अर्थात नगरों में प्रचलित लिपि कहते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार बौद्धों के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘ललित विस्तारकी नाग लिपि ही नागरी है, किंतु डा० एबष्टी वार्नर अनुसार ‘नागलिपि’ नागरी में कोई संबंध नहीं है।
  • तांत्रिक चिह्न ‘देवनागर’ से समानता होने के कारण इसे देवनागरी और फिर नागरी’ कहा गया।देवनागर अर्थात काशी में प्रचार के कारण यह कहलाई तथा नागरी उसी का संक्षिप्त रूप है। – देवनागरी उपर्युक्त मतों में से कोई भी मत आधार सठीक नहीं है।

इसके नागरी’ नाम की व्युत्पत्ति का प्रश्न आज भी अनिर्मित है। भारत की प्राचीन लिपि ब्राहमी का प्रयोग पाँचवीं सक्ष से लेकर लगभग ३५० ई तक होता रहा । इसके बाद इसके शैलियों – उत्तरी शैली तथा (2) दक्षिणी शैली का विकास हुआ। चौथी सदी में उत्तरी शैली से गुप्त लिपि का विकार हुआ जो पाँचवीं सदी तक प्रयुक्त होती रही। छठी सदी में ? लिपि से कुटिल लिपि विकसित हुई, जो आठवीं सदी स प्रयुक्त होती रही । नौवीं सदी के लगभग इस कुटिल हि T से प्राचीन नागरी का विकास हुआ । इस प्राचीन नागरी ही आधुनिक नागरी विकसित हुई थी।

नागरी का विकास:

नागरी लिपि के लगभग एक हड वर्षों के जीवन काल में प्राय: सभी अक्षरों में न्यूनाविक रूप में परिवर्तन हुए हैं, किंतु इन परिवर्तनों के अतिरिक्त, कुछ उल्लेखनीय बातें नागरी लिपि में आई हैं,

  • जो सबसे महत्वपूर्ण बात फारसी लिपि का प्रभाव नागरी लिपि में नुक्ते का प्रयोग फारसी लिपिका ही प्रभाव है। फारसी लिपि  मूलतः बिंदु प्रधान लिपि कही गई है।
  • नागरी लिपि के ऊपर मराठी लिपि का भी प्रभाव पड़ा है। इसमें गुजराती लिपि का प्रभाव है क्योंकि गुजरात लिपि शिरोरेखा विहीन लिपि है। कॉलेज, ऑफिस जैसे शब्दों में आँ के लेखन का प्रयोग नागरी में अंग्रेजी के प्रयोग से ही आया है। इस प्रकार फरसी, मराठी, गुजराती तथा अंग्रेजी ध्वनियों के ज्ञान ने भी नागरी लिपि को प्रभावित किया। इसके फलस्वरूप नागरी को न्यूनाधिक रूप में परिवर्तित और विकसित किया है।

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1- भाषा की ध्वनि व्यवस्था

२। हिंदी में वाक्य व्यवस्था 

३। हिंदी पदबंध

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1. VOCABULARY GUIDE

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