हिंदी में कारक – भेद, विभक्तियाँ और मूल तथ्य

karak in hindi | हिंदी में कारक

हिंदी में कारक –भेद, विभक्तियाँ और मूल तथ्य

 

karak in hindi – हिंदी में कारक – वाक्य में क्रिया तथा संज्ञा और सर्वनाम पदों के बीच पाए जाने वाले संबंधों को कारक कहते हैं। क्रिया तथा संज्ञा और सर्वनाम पदों के ये संबंध अर्थ के धरातल पर निश्चित किए जाते हैं, जैसे-

मोहन ने कलम से पत्र लिखा।

इस वाक्य में ‘मोहन’ पत्र तथा कलम संज्ञा पदों का संबंध ‘लिखा’ क्रिया से सूचित हो रहा है। इस वाक्य में मोहन’ कर्ता, ‘पत्र’ कर्म तथा ‘कलम’ साधन है, जिसकी सहायता ‘लिखना’ क्रिया संपन्न हुई है।

इस प्रकार कारक ऐसी व्याकरणिक कोटि है, जिससे यह पता चलता है कि संज्ञा पद या सर्वनाम पद वाक्य में स्थित क्रिया के माध्य किस प्रकार की भूमिका निभाते हैं।

karak in hindi – हिंदी में कारक और विभक्ति को एक मानने की चाल कदाचित् अंगरेजी व्याकरण का फल है, क्योंकि सबसे प्रथम हिन्दी व्याकरण पादरी आदम साहब ने लिखा था। इस व्याकरण में ‘कारक’ शब्द आया है, परंतु ‘विभक्ति’ शब्द का नाम पुस्तक भर में कहीं नहीं है।

दो एक लेखकों के लिखने पर भी आज तक के हिन्दी व्याकरणों में कारक और विभक्ति का अंतर नहीं माना गया है। हिन्दी वैयाकरणों के विचार में इन दोनों शब्दों के अर्थ की एकता यहाँ तक स्थिर हो गई है कि व्यासजी सरीखे संस्कृत के विद्वान् ने भी भाषा प्रभाकर'” में विभक्ति के बदले ‘कारक’ शब्द का प्रयोग किया है।

हाल में पं. गोविंदनारायण मिश्र ने अपने विभक्ति विचार’ में लिखा है कि “स्वर्गीय पं. दामोदर शास्त्री से ही संभव है कि, सबसे पहले स्वरचित व्याकरण में कर्ता, कर्म, करण, आदि कारकों के प्रयोग का यथोचित खंडन कर प्रथम, द्वितीया तथा विभक्ति शब्द का प्रयोग उनके बदले में करने के साथ ही इसका युक्तियुक् प्रतिपादन भी किया था।”

इस तरह से इस बहुत ही पुरानी भूल को सुधारने की ओर आजकल लेखकों का ध्यान हुआ है। अब हमें यह देखना चाहिए कि इस भूल को सुधारने से हिन्दी व्याकरण को क्या लाभ हो सकता है।


karak in hindi – हिंदी में कारक

विभक्तियों की व्युत्पत्ति

हिन्दी की अधिकांश विभक्तियाँ प्राकृत के द्वारा संस्कृत से निकली हैं, परंतु इन भाषाओं के विरुद्ध हिन्दी की विभक्तियाँ दोनों वचनों में एक रूप रहती हैं। इन विभक्तियों को कोई-कोई वैयाकरण प्रत्यय नहीं मानते, किंतु सम्बन्धसूचक अव्ययों में गिनते हैं।

यहाँ केवल विभक्तियों की व्युत्पत्ति केवल दो एक व्याकरणों में संक्षेपतः लिखी गई है, पर इसका सविस्तार विवेचन विलायती विद्वानों ने किया है। मिश्रजी ने भी अपने ‘विभक्ति- विचार’ में इस विषय की योग्य समालोचना की है। तथापि हिन्दी विभक्तियों की व्युत्पत्ति बहुत ही विवादग्रस्त विषय है।

इसमें बहुत कुछ मूल शोध की आवश्यकता। है और जब तक अपभ्रंश, प्राकृत और प्राचीन हिन्दी के बीच की भाषा का पता न लगे तब तक यह विषय बहुधा अनुमान ही रहेगा।


karak in hindi – हिंदी में कारक

हिंदी भाषा में कारक के मुख्य रूप से छह भेद या प्रकार माने गए हैं

  • karak in hindi – हिंदी में कारक- कर्ता करक

क्रिया से जिस वस्तु के विषय में विधान किया जाता है उसे सूचित करनेवाले संज्ञा के रूप को कर्त्ता कारक कहते हैं; जैसे, लड़का सोता है। नौकर ने दरवाजा खोला। चिट्ठी भेजी जायेगी।

* कर्त्ता कारक का यह लक्षण दूसरे व्याकरणों में दिए हुए लक्षणों से भिन्न है। हिन्दी में कारक और विभक्ति का संस्कृतरूढ़ अंतर न मानने के कारण इस लक्षण की आवश्यकता हुई है। इसमें केवल व्यापार के आश्रय ही का समावेश नहीं होता; किंतु स्थितिदर्शक और विकारदर्शक क्रियाओं के कर्त्ताओं का भी (जो यथार्थ में व्यापार के आश्रय नहीं है) समावेश हो सकता है। इसके सिवा सकर्मक क्रिया के कर्मवाच्य में कर्म का जो मुख्य रूप होता है उसका भी समावेश इस लक्षण में हो जाता है।

याद रखने योग्य बातें

  • बिना परसर्ग के कर्त्ता का प्रयोग कर्त्तरि प्रयोग कहलाता है।जैसे- विदिशा घर गई ।
  • परसर्ग के साथ कर्त्ता का प्रयोग कर्मणि प्रयोग कहलाता है। जैसे-‘तुमने खाना खाया ?
  • ‘ने’ परसर्ग का प्रयोग सामान्यतः अकर्मक क्रिया के साथ नहीं होता। सकर्मक क्रिया के साथ अपूर्ण भूत को छोड़कर सभी प्रकार के
  • भूतकाल में ‘ने’ का प्रयोग होता है।
  • वर्तमान और भविष्य काल में प्राय: ‘ने’ का प्रयोग नहीं होता।

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  • karak in hindi – हिंदी में कारक – कर्म कारक

जिस वस्तु पर क्रिया के व्यापार का फल पड़ता है, उसे सूचित करनेवाले संज्ञा के रूप को कर्म कारक कहते हैं; जैसे, ‘मालिक ने नौकर को बुलाया।”

याद रखने योग्य बातें –

  • जब विशेषण संज्ञा रूप में प्रयुक्त होकर कर्मकारक बने, तो ‘को’ का प्रयोग आवश्यक है;
  • प्रायः ‘को’ चिह्न का प्रयोग चेतन या सजीव कर्म के साथ होता है।
  • समय, दिन, तिथि प्रकट करने में ‘को’ का प्रयोग होता है।

  • karak in hindi – हिंदी में कारक – करण कारक –

करण कारक संज्ञा के उस रूप को कहते हैं जिससे क्रिया के साधन का बोध होता है; जैसे – ‘सिपाही चोर को रस्सी से बाँधता है।’ ‘लड़के ने हाथ से फल तोड़ा।’ ‘मनुष्य आँखों से देखते हैं, कानों से सुनते हैं और बुद्धि से विचार करते हैं।’


  • karak in hindi – हिंदी में कारकसंप्रदान कारक –

जिस वस्तु के लिये क्रिया की जाती है उसकी वाचक संज्ञा के रूप को संप्रदान कारक कहते हैं; जैसे, ‘राजा ने ब्राह्मण को धन दिया।’ ‘शुकदेव मुनि द्वारा राजा परीक्षित को कथा सुनाते हैं।’ ‘लड़का नहाने को गया है।


  • karak in hindi – हिंदी में कारकअपादान कारक –

अपादान कारक संज्ञा के उस रूप को कहते हैं जिससे क्रिया के विभाग कीअवधि सूचित होती है; जैसे पेड़ से फल गिरा।’ ‘गंगा हिमालय से निकलती है।’


  • karak in hindi – हिंदी में कारकअधिकरण कारक –

संज्ञा का वह रूप जिससे क्रिया के आधार का बोध होता है अधिकरण कारक कहलाता है; जैसे – सिंह वन में रहता है।’ ‘बंदर पेड़ पर चढ़ रहे हैं।’ कभी कभी इसमें परसर्ग का लोप भी हो जाता है।


karak in hindi – हिंदी में कारक 

कुछ विद्वान हिंदी में कारक के दो अन्य भेद भी मानते हैं, लेकिन इन दोनों कारकों के संबंध में विद्वानों में आपस में विवाद है, क्योंकि इन दोनों कारकों संबंध क्रिया के साथ न होकर वाक्य में आए अन्य पदों से होता है। ये दोनों कारक है – 1) संबंध कारक (2) संबोधन कारक

 

  • karak in hindi – हिंदी में कारक – संबंध कारक-

संज्ञा के जिस रूप से उसकी वाच्य वस्तु का सम्बन्ध किसी दूसरी वस्तु के साथ सूचित होता है उस          रूप को सम्बन्ध कारक कहते हैं; जैसे राजा का महल, लड़के की पुस्तक, पत्थर के टुकड़े, इत्यादि ।        सम्बन्ध कारक का रूप संबंधी शब्द के लिंग वचन के कारण बदलता है।


  • karak in hindi – हिंदी में कारक – संबोधन कारक –

संज्ञा के जिस रूप से किसी को चिताना या पुकारना सूचित होता है उसे सम्बन्ध कारक कहते हैं; 

जैसे ‘हे नाथ! मेरे अपराधों को क्षमा करना।’ ‘छिपे हो कौन से परदे में बेटा!’ ‘अरे लड़के, इधर आ।’


karak chinh | कारक चिन्ह

हिंदी भाषा में इन सभी कारकों को इस प्रकार समझा जा सकता है- 

करक विभक्तियाँ उदहारण 
कर्ताने मोहन किताब पढ़ता है। (ने-परसर्ग रहित)
मोहन ने किताब चढ़ी । ( ने  परसर्ग सहित )
कर्म को अध्यापक ने छात्रों को पढ़ाया।
करण से , के  द्वारा  सुरेश ने कलम से पत्र लिखा ।
संप्रदान को , के लिए मैं बच्चों के लिए खिलौने लाया ।
भिक्षुक को भिक्षा दे दो।
अपादान से पेड़ से फल गिरे।
मैं दिल्ली से आज ही आया हूँ।
संबंध का के, की, रा, रे, री, ना, ने, नीयह मोहन का कोट है। 
   ये मोहन के कपड़े हैं।
अधिकरण में, परछात्र कमरे में बैठे हैं।
  किताबें मेज पर रखी हैं।
संबोधन हे ,अरे, ओ,ए लड़के! यह सामान वहाँ रख दो |
  हे ईश्वर | मेरी रक्षा करो |
  अरे भाई ! ऐसा काम मत करो।

     

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    मूल बातें –

    “कारक”, “परसर्ग” तथा “विभक्ति” इन तीनों में अंतर है। प्रायः इन तीनों के अर्थ के सम्बन्ध में अस्पष्ट एवं कभी-कभी भ्रामक विचार प्रकट होते रहते हैं। विभक्ति” संस्कृत के अष्टाध्यायी में प्रयुक्त शब्द है यह प्रत्यय का एक भेद है।

    पाणिनि ने “सुप्” प्रत्यय एवं तिंग प्रत्यय नाम से दो प्रत्यय वर्गों का प्रतिपादन किया है। और उन्हें विभक्ति” नाम दिया है। इनमें से “सुप्” नाम से अभिहित 36 प्रत्यय लगाकर संज्ञा एवं विशेषण पद बनाए जाते हैं तथा तिंग नामक 36 प्रत्यय लगाकर क्रिया रूप निष्पन्न किए जाते हैं।

    “विभक्ति” आधुनिक भाषाविज्ञान की दृष्टि से एक व्याकरणिक अंश है। तथा पदरूपों का निर्माण करता है। परसर्ग” वास्तव में आधुनिक प्रयोग है। यह संस्कृत के “उपसर्ग” के वर्जन पर बनाया गया नया शब्द है।

    यह एक रूपिम है जो संज्ञा शब्द के साथ संलग्न होता है यथा घर में मेज पर लड़के से गाँव के पास यह परसर्ग भी व्याकरणिक अंश है और रूपिम है।

    हिन्दी के प्राचीनतम वैयाकरणों में कामता प्रसाद गुरु, केलॉग के नाम लिये जा सकते हैं। गुरुजी ने हिन्दी व्याकरण में कारक की परिभाषा इस प्रकार दी है-“संज्ञा (या सर्वनाम) के जिस रूप से उसका सम्बन्ध वाक्य के किसी दूसरे शब्द के साथ प्रकाशित होता है, उस रूप को “कारक” कहते हैं। यह परिभाषा संस्कृत वैयाकरणों द्वारा की गई परिभाषा से भिन्न है।

    संस्कृत वैयाकरणों ने क्रियान्यित्वम् क्रियाजनकत्वम् अथवा क्रियाश्रयत्वम् को कारक कहा है। इससे स्पष्ट है कि वाक्यगत पद अथवा पदबंध को क्रिया के साथ जोड़ने वाला तत्व “कारक” है।

    दूसरे शब्दों में संज्ञा का क्रिया के साथ अन्वय ही कारक है। परन्तु कारक व्याकरण के अनुसार न तो रूप, न तत्व, न अन्वय ही केवल कारक है, अपितु संज्ञा का क्रिया के साथ आर्थी सम्बन्ध ही कारक (गहन) है।

    गुरु जी की परिभाषा में कारक वह तत्व है जो एक संज्ञा शब्द को वाक्य के किसी दूसरे शब्द के साथ जोड़ता है।

    संस्कृत वैयाकरणों के अनुसार तथाकथित सम्बन्ध कारक वास्तव में कारक नहीं होता। क्योंकि सम्बन्ध एक संज्ञा शब्द से अभिहित अर्थ का दूसरी संज्ञा से अभिहित अर्थ के साथ होता है न कि साक्षात क्रिया के साथ।

    अतएवं संस्कृत परिभाषा के अनुसार सम्बन्ध तत्व कारक की कोटि में नहीं आता जबकि गुरुजी की व्याख्या के अनुसार वह कारक कोटि में आता है। क्योंकि जिसका सम्बन्ध बताया जा रहा है। ये दोनों वाक्य में विद्यमान है।

    संस्कृत में कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान अपादान एवम् अधिकरण। ये छः कारक है। हिन्दी में उपर्युक्त छः कारकों के साथ सम्बन्ध को भी जोड़कर सात कारक माने गए है। यह संख्या कामता प्रसाद के अनुसार है।

    हिन्दी का व्याकरण लिखने वाले परवर्ती वैयाकरणों में से कुछ ने कामता प्रसाद गुरु जैसी परिभाषा दी है। कुछ ने संस्कृत वैयाकरणों का अनुसरण करके अपनी व्याख्या की

    उपर्युक्त दोनों मतों का समन्वय करते हुए कुछ हिन्दी वैयाकरणों ने इस प्रकार परिभाषा दी है-“कारकत्व प्रातिपदिक के अर्थ में निहित शक्ति का नाम है जिसका क्रिया से साक्षात या परम्परा से सम्बन्ध होता है।

     


    सारांश –

    1. क्रिया के साथ जिसका सीधा सम्बन्ध हो, उसे कारक कहते हैं।
    2. संस्कृत व्याकरण में छः कारक तथा सात विभक्तियाँ मानी गई हैं।
    3. संस्कृत वैयाकरण षष्ठी विभक्ति को कारक नहीं मानते। हिन्दी में आठ कारक माने गए हैं।
    4. कर्त्ता प्रथमा विभक्ति-ने, कर्म-द्वितीया विभक्ति को, करण-तृतीया विभक्ति-से / द्वारा, सम्प्रदान-चतुर्थी के लिए, अपादान-पंचमी-से (अलग होना), सम्बन्ध षष्ठी विभक्ति का, के, की, रा, रे, री, अधिकरण-सप्तमी में, पै, पर,
    5. सम्बोधन-अष्टमी-हे, अरे।
    6. विभक्ति चिह्न ‘परसर्ग’ कहलाते हैं। कर्ता कारक क्रिया को करने वाला।
    7. कर्म कारक-जिस शब्द पर क्रिया का प्रभाव पड़े।
    8. करण कारक जिसकी सहायता से क्रिया सम्पादित हो । • सम्प्रदान कारक-जिसके लिए क्रिया की जाए।
    9. अपादान कारक शब्दों से अलग होना प्रकट हो ।
    10. सम्बन्ध कारक क्रिया से भिन्न अन्य कारकों के सम्बन्ध प्रकट करने वाले शब्द।
    11. अधिकरण कारक क्रिया होने के आधार को सूचित करने वाले शब्द।
    12. सम्बोधन कारक क्रिया के लिए जिसे सम्बोधित किया जाए।

     


    अभ्यास के लिए प्रश्न :-

    1. अधिकरण कारक का परसर्ग है

    (a) का, के, की

    (b) में, पैं, पर

    (c) के लिए

    (d) से द्वारा

    2. सम्बोधन कारक का परसर्ग है.

    (a) का, के, की

    (b) में, पर

    (c) हे. अरे

    (d) से (द्वारा)

    3. वाक्य में क्रिया को करने वाला है

    (a) कर्म कारक

    (b) कर्त्ता कारक

    (c) करण कारक

    (d) सम्प्रदान कारक

    4. जिस शब्द पर क्रिया का सीधा प्रभाव पड़ता है, वह कहलाता है

    (a) कर्म कारक

    (b) करण कारक

    (c) सम्प्रदान कारक

    (d) अपादान कारक

    5. जिसकी सहायता से क्रिया सम्पादित हो, उसे कहते हैं

    (a) कर्म कारक

    (c) करण कारक

    (b) कर्ता कारक

    (d) सम्बन्ध कारक

    6. जिसके लिए क्रिया की जाती है, वह है

    (a) कर्म कारक

    (b) कर्त्ता कारक

    (d) सम्प्रदान कारक

    (c) अधिकरण कारक

    7. अलग होना, तुलना, निरन्तरता, संयोग, उद्भव आदि का सूचक है

    (a) अपादान कारक

    (b) कर्त्ता कारक

    (c) कर्म कारक

    (d) अधिकरण कारक

    8. क्रिया के विपरीत अन्य कारकों से सम्बन्ध है

    (a) कर्ता कारक (

    (b) सम्बन्ध कारक

    c) कर्म कारक

    (d) करण कारक

    9. क्रिया होने के आधार को सूचित करने वाला कारक है

    (a) कर्त्ता कारक

    (b) सम्बन्ध कारक

    (c) अधिकरण कारक

    (d) करण कारक

    10. क्रिया के लिए जिसे सम्बोधित किया जाता है

    (a) कर्त्ता कारक

    (c) अधिकरण कारक

    (b) सम्बन्ध कारक

    (d) सम्बोधन कारक

    11. बन्दर मनुष्य का पूर्वज कहा जाता है। कारक छाँटिए

    (a) बन्दर (कर्ता)

    (b) मनुष्य (कर्त्ता कारक)

    (c) पूर्वज (कर्ता)

    (d) ‘a’ तथा ” दोनों

    12. ‘वृन्दावन में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष उत्सव होते

    विकल्पों में से कौन सही है ?

    (a) वृन्दावन (अधिकरण)

    (b) श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (अधिकरण)

    (c) उत्सव (अधिकरण) (d) तथा ‘b’ दोनों

    13. मैं अपनी दादी को बहुत श्रद्धा की दृष्टि से देखता विकल्पों में से कौन सही है ?

    (a) मैं (कर्ता)

    (b) दादी को (कर्म)

    (c) करण

    (d) ये सभी सही है


     

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