क्रिया

kriya in Hindi 

क्रिया | verb in Hindi| kriya ke kitne bhed hote hain

kriya in hindi (परिभाषा) – जिस शब्द या पद से किसी कार्य के करने या होने का बोध होता है, उसे क्रिया कहते हैं। उदाहरणतयानिम्नलिखित वाक्यों में प्रयुक्त रेखांकित पदों को देखिए –

  • चिड़िया आकाश में उड़ रही है
  • मोहन पार्क में जोड़ता है
  • विनोद दूध अवश्य पीता है
  • तुमने शाम को किताब दी थी।
  • बर्फ पिघल रही है।
  • तुम्हारी किताब मेज पर है।

ये सभी पद किसी-न-किसी कार्य के करने (उड़ना, जोड़ना , पीना, पिघलना, देना ) होने ( होना) के सूचक हैं। अतः ये क्रियापद हैं।

 

मुख्य बातें – kriya in hindi

  • क्रिया-पद में एक अथवा अधिक शब्द होते हैं; जैसे— है, उड़ रही है , जोड़ता है , पिघल रही है\
  • प्रायः वाक्य में क्रिया-पद अवश्य होता है और यह प्रायः अंत में होता है।
  • कहीं-कहीं क्रिया प्रत्यक्ष नहीं होती, पर परोक्ष रूप से उपस्थित रहती है।

धातु की परिभाषा ( kriya in hindi)

क्रिया के मूल अंश को धातु कहते हैं। जैसे-पढ़, लिख, सो, रो, हँस, खेल, देख आदि। स्पष्टीकरण- पढ़ धातु से अनेक क्रिया-रूप बनते हैं। जैसे – लिखता है , लिखना होगा , लिखेगा आदि  परंतु इन सब में सामान्य रूप है- ‘ लिख ‘। इसी को मूल धातु कहते है।

मूल धातु की पहचान – अगर आप मूल धातु की पहचान करना चाहते हैं तो मूल धातु के साथ “तू ” शब्द शब्द को जोड़ दें और फिर आप देखिएगा कि “तू ” शब्द के मिलने पर वह शब्द आज्ञार्थक क्रिया बन जाता है। जैसे- तू खा, , तू हँस, तू खेल आदि। इनमें खा, हँस, खेल आदि मूल धातु है ।

क्रिया के सामान्य रूप -धातु में ‘ना’ प्रत्यय लगाने से क्रिया के सामान्य रूप बन जाते हैं। जैसे – पढ़ + ना = पढ़ना; सो + ना – सोना; हँस + ना = हँसना; खेल + ना = खेलना आदि।

kriya ke kitne bhed hote hain | क्रिया के कितने भेद होते हैं 

कर्म के आधार पर क्रिया (kriya in hindi) के दो भेद हैं :

1. अकर्मक क्रिया  2. सकर्मक क्रिया

निम्नलिखित वाक्यों को देखिये –

(क) सीता खेलती है ।

(ख) धोबी कपड़े धो रहा है।

  •  पहले वाक्य में ‘ खेलती’   है’– क्रिया से पूरी बात स्पष्ट हो जाती है और क्रिया-पद से ही काम का बोध हो जाता है।
  • दूसरे वाक्य में ऐसी बात नहीं है। ‘धोबी’  धो रहा है’ से यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि धोबी धो रहा है? जब तक ‘कपड़े’ न कहा जाए तब तक कथन पूरा नहीं होता।

इस वाक्य में ‘कपड़े’ ‘धो रहा है’ क्रिया-पद का कर्म है। ऊपर के वाक्यों में ‘ खेलती  है’ क्रिया को किसी कर्म की आवश्यकता नहीं है, अतः यह क्रिया अकर्मक है।

‘धो रहा है’ क्रिया पद में ‘कपड़े’ (कर्म) की आवश्यकता है, अतः यह सकर्मक क्रिया है। इस प्रकार क्रिया के दो भेद हुए-अकर्मक क्रिया और सकर्मक क्रिया।


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अकर्मक क्रिया ( Intransitive Verb)

अकर्मक क्रिया का प्रभाव सीधे कर्ता पर पड़ता है। अर्थात इन क्रियाओं में कर्म की आवश्यकता नहीं होती । उदाहरणतया – रीमा लिखती है ।यहाँ ‘ लिखना ‘ क्रिया का फल सीधे कर्ता रीमा  पर पड़ रहा है तथा  इस वाक्य में ‘कर्म’ का लोप हो गया  है और सही मायने में कर्म की आवश्यकता भी नहीं है ।

अन्य उदाहरण-

  • शीला रोएगी।
  • बच्चे हँस रहे हैं।
  • वह तुम्हारे लिए रुका हुआ है।
  • कुछ पाना है तो झुको।
  • अतिथि जाग गया है।
  • सर्दी के कारण सभी छींक रहे हैं।
  • वह घर आ चुका है।
  • मेहमान जा चुके हैं।

मुख्य बातें –  अगर अकर्मक क्रिया की पहचान करनी है तो उस अकर्मक क्रिया के साथ ” क्या, किसे, किसको ” लगाकर प्रश्न बनायें पर यदि कोई उत्तर नहीं मिलता है तो वहां अवश्य ही कई कर्म नहीं है और बिना कर्म वाले क्रिया को अकर्मक क्रिया कहते हैं। 

जैसे – रामु हँसता है । — क्या हँसता है ? — कोई उतर नहीं मिला , तो यहाँ अकर्मक क्रिया है ।

अकर्मक क्रिया के भेद

अकर्मक क्रिया के दो भेद होते हैं –

  1. स्थित्यर्थक पूर्ण अकर्मक क्रिया
  2. गत्यर्थक पूर्ण अकर्मक क्रिया
  3. अपूर्ण अकर्मक क्रिया

स्थित्यर्थक पूर्ण अकर्मक क्रिया

यह क्रिया ऐसी क्रियाएं होती है जो  बिना कर्म के ही पूर्ण अर्थ दे देती है और यहाँ कर्ता भी स्थिर हो जाता है  है। जैसे

  • रोहित गा रहा है। ( गाने की दशा)
  • मोहन हँसता है। (हँसने की दशा)
  • श्यामा रो रही है। (रोने की दशा)

खिलना, अनुभव करना आदि ऐसी ही क्रियाएँ हैं। अस्तित्ववाची क्रियाएँ भी इसी भेद के अंतर्गत आती हैं। जैसे- ‘परमात्मा है।’ यहाँ ‘है’ क्रिया स्वयं में पूर्ण तथा स्थित्यर्थक है।

गत्यर्थक पूर्ण अकर्मक क्रिया

गत्यर्थक पूर्ण अकर्मक क्रिया-यह क्रिया भी बिना कर्म के पूर्ण होती है और कर्ता की गतिमान दशा का बोध कराती है। उदाहरणतया-

सीता अयोध्या जा रही है।

यहाँ ‘जा रही  है’ क्रिया कर्ता के गतिमान होने का आभास कराती  है। यहाँ कर्म की भी आवश्यकता नहीं है। अतः यह गत्यर्थक पूर्ण अकर्मक क्रिया है। कुछ अन्य उदाहरण-

  • चिड़िया आकाश में उड़ रही है।
  • सोहन कमरे से निकल रहा है।
  • सूरज पश्चिम में डूबेगा।

अपूर्ण (पूरकांक्षी) अकर्मक क्रिया

जो अकर्मक क्रियाएँ स्वयं में पूर्ण नहीं होतीं, उन्हें अपूर्ण अकर्मक क्रियाएँ कहते हैं। इन क्रियाओं का कर्ता से संबंध बनाने के लिए किसी न किसी संज्ञा या विशेषण शब्द की आवश्यकता पड़ती है। जैसे-

गोलू झगड़ालू है।

विश्वजीत डॉक्टर बनेगा।

हरजोत समझदार निकली।

फ़िल्म पारिवारिक है।

इन वाक्यों में बनेगा, है, निकली,  – अपूर्ण अकर्मक क्रियाएँ हैं। इन क्रियाओं का कर्ता से संबंध बनाने वाले पूरक शब्द हैं— डॉक्टर, समझदार, पारिवारिक और झगड़ालु ।

अपूर्ण अकर्मक क्रियाएँ में प्रायः बनना, निकलना और होना प्रमुख रूप से देखा जाता है । पूरक बनाने वाले शब्द प्रायः संज्ञा और विशेषण ही होते हैं।

यह ध्यान रखें कि इन क्रियाओं को कर्म की अपेक्षा नहीं होती।


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सकर्मक क्रिया

सकर्मक क्रिया – जिस क्रिया के प्रयोग में ‘कर्म’ की आवश्यकता पड़ती है और उसका सीधा प्रभाव कर्म पर पड़ता है, उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं। उदाहरणतया- राजू ने पुस्तक खरीदी।

‘खरीदी’ क्रिया के प्रयोग में ‘कर्म’ (पुस्तक) की आवश्यकता अनिवार्य रूप से बनी हुई है। अगर ‘पुस्तक’ का लोप कर दिया जाए तो अर्थ अस्पष्ट या अपूर्ण रह जाएगा। उदाहरणतया अनुराग ने खरीदी। इस वाक्य में जिज्ञासा बनी ही हुई है कि क्या खरीदी? और दूसरी तरफ आप देखे तो क्रिया ( खरीदी )का फल पुस्तक पर है। अतः यह सकर्मक क्रिया है।

सकर्मक क्रियाएँ के कुछ महत्त्वपूर्ण उदाहरण इस प्रकार  हैं—-

देख, सुन, पढ़ लिख कर, हो, कह, सूँघ, खा, पी, ले, दे, मार, छोड़, काट, पीट, तोड़, बेच आदि। इन्हीं से बनने वाली प्रेरक क्रियाएँ भी सकर्मक होती हैं। जैसे-

देख – दिखा – दिखावा

लिख – लिखा – लिखावा

सुन – सुना – सुनवा

मुख्य बातें – किसी भी वाक्य के क्रिया के पहले  क्या , किसे, अथवा किसको लगाकर प्रश्न पूछने पर यदि कोई सटीक उत्तर मिलता है तो क्रिया सकर्मक होती है । उत्तर मिलने वाला शब्द ‘कर्म ‘ होता है। 

जैसे – राजू ने पुस्तक खरीदी

प्रश्न – क्या खरीदी ?

उत्तर – पुस्तक


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सकर्मक क्रिया के  कितने भेद होते हैं

 सकर्मक क्रिया के निम्नलिखित तीन भेद होते हैं-

  1. पूर्ण एककर्मक क्रियाएं
  2. पूर्ण द्विकर्मक क्रियाएँ
  3. अपूर्ण सकर्मक क्रियाएँ

पूर्ण एककर्मक क्रियाएं

सामान्यतः ‘सकर्मक क्रिया‘ के नाम से जाना जाता है। इन क्रियाओं में एक कर्म की आवश्यकता होती है। उदाहरणत- कुत्ते ने बकरी को काटा।

यहाँ ‘काटा’ क्रिया ‘कर्म’ (बकरी को) के बिना अधूरी है, तथा इस कर्म के समावेश से अर्थ भी पूरा और किसी कर्म की आवश्यकता नहीं रही है। इसलिए यह ‘पूर्ण एककर्मक क्रिया’ है। कुछ अन्य उदाहरण देखिए –

  • अब सीमा खाना खा रही है।
  • दर्जी कपड़े सिएगा।
  • अब्दुल पत्र लिखेगा।

पूर्ण द्विकर्मक क्रियाएँ –

पूर्ण द्विकर्मक क्रियाएँ वे होती हैं जिनमें दो कमों की आवश्यकता होती है।

उदाहरणार्थ- संतोष ने बेटे को पता बताया था। इस वाक्य में दो कर्म हैं- ‘बेटे को’ तथा ‘पता’। यदि इनमें से एक कर्म हटा लिया जाए तो अर्थ अस्पष्ट रह जाएगा।

अन्य उदाहरण देखिए

  • मोहन ने सोहन को अपनी घड़ी दी।
  • शीला ने रमा को गाना सुनाया।
  • राम ने मोहन को किताब दी।
  • विनोद ने मनोज को कार बेची।

प्रायः देना लेना बताना आदि प्रेरणार्थक क्रियाएँ इसी कोटि के अंतर्गत आती हैं। ‘देना’ क्रिया में दो कर्म नहीं होते। एक कर्म जैसे ‘मोहन को संप्रदान कारक के अंतर्गत आता है। परंतु मोटे तौर पर उसे कर्म मान लिया जाता है।

अपूर्ण सकर्मक क्रियाएँ

अपूर्ण सकर्मक क्रियाएँ ये वे क्रियाएँ हैं जिनमें कर्म रहते हुए भी कर्म के किसी पूरक शब्द की आवश्यकता बनी रहती है। वरना अर्थ अपूर्ण रहता है। चुनना मानना, समझना, बनाना आदि ऐसी ही क्रियाएँ हैं। उदाहरणतया – सोहन अमित को मूर्ख समझता है।

इस वाक्य में ‘अमित को’ कर्म है। परंतु यह कर्म अकेले अधूरा अर्थ देता है। ‘मूर्ख’ पूरक के आने पर अर्थ स्पष्ट होता है। ‘मूर्ख’ का संबंध ‘अमित’ (कर्म) से होने के कारण हम उसे ‘कर्मपूरक’ कहते हैं। कुछ अन्य उदाहरण –

  • छात्रों ने दीपक को अपना प्रतिनिधि चुना।
  • वह तुम्हें मित्र मानता है।
  • सभी लड़के इंद्रपाल को पागल बनाते हैं।

 

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प्रेरणार्थक क्रिया 

जिस क्रिया से कर्ताद्वारा स्वयं कार्य किए जाने का बोध्यमही होता है, चरन् किसी अन्य व्यक्ति द्वारा (से) कार्य कराए जाने का बोध होता है, उसे प्रेरणार्थक क्रिया कहते हैं। प्रेरणार्थक क्रिया मूलत: सकर्मक क्रिया होती है। जैसे-  

(क )एक मोहन सोहन से काम कराता है।

( ख ) माँ नौकरानी से बच्चे को दूध पिलवाती है।

इन वाक्यों में वाक्य () में काम करने का कार्य मोहन नहीं कर रहा है, वरन मोहन की प्रेरणा से सोहन करता है। अर्थात मोहन स्वयं काम न करके सोहन से कराता है। यहाँ मोहन प्रेरक कर्ता है।

वाक्य () में बच्चे को दूध पिलाने का काम माँ नहीं भारती, बल्कि माँ की प्रेरणा से अर्थात् माँ के कहने पर नौकरानी दूध पिलाती है। इसलिए कराना और पिलवाना प्रेरणार्थक क्रियाएँ हैं। इन दोनों वाक्यों में क्रमश: मोहन और माँ प्रेरक कर्ता है।

 प्रेरणार्थक क्रियाएं दो प्रकार की होती हैं

(क) एक प्रथम प्रेरणार्थक क्रिया () द्वितीय प्रेरणार्थक क्रिया।

(क)  प्रथम प्रेरणार्थक क्रिया : मोहन चिड़िया उड्डा रहा है। इस वाक्य में उड़ानाक्रिया वस्तुतः प्रेरणार्थक क्रिया मूल क्रिया नहीं है। यह उड़ानाप्रेरणार्थक क्रिया तो मूल अकर्मक क्रियाउड़नामें आ प्रत्यक्ष लगकर बनी है।

प्रेरणार्थकक्रिया अकर्मक और सकर्मक दोनों ही प्रकार की क्रियाओं से व्युत्पन्न हो सकती हैं। हान सकती हैं) , जैसेपीना (पिल) पिलाना, खाना (खिल) खिलाना देना (दिल) क दिलाना, कर कराना इत्यादि । प्रथम प्रेरणार्थक क्रिया प्राय: मूलसकर्मक क्रिया का भी काम करती है।

इसके धातु रूपके साथ ( बाद में ) –आ प्रत्यय जुड़ता है जैसे -करना -कराना,  

भूलना भुलाना, खेलना खिलाना, हँसना हँसाना, रोना रुलाना इत्यादि ।

 

(ख) द्वितीय प्रेरणार्थक क्रिया : – () माँ नौकरानी से बच्चे को दूध पिलकती है। () मोहन नौकर से कपड़े धुलवा रहा है। इन वाक्यों में प्रयुक्त पिलवानातथा ‘ धुलवाना क्रिया रूप द्वितीय प्रेरणार्थक किया रूप है। क्योंकि वाक्य ()में माँ नौकरानी को प्रेरित करती है तथा नौकरानी बच्चे को प्रेरित करती है तब बच्चा दूध पीता है।

इसी प्रकार वाक्य () में मोहन के नौकर को प्रेरित करने पर नौकर कपड़े धोता है। इन वाक्यों में माँ और मोहन प्रेरक कर्त्ता हैं। द्वितीय प्रेरणार्थक क्रिया में क्रिया धातु (रूप) के साथ ‘वा’ प्रत्यय जुड़ता है?

 जैसेकरना – करवाना, खिलाना -खिलवाना, पिलाना -पिलवाना, लिखाना -लिखवाना, पढ़ाना पढ़वाना इत्यादि।


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नामिक क्रिया 

 नामिक क्रियाओं में आने वाली धातुएँ नाम धातुएँ कही जाती है। संज्ञा, सर्वनाम तथा विशेषण शब्दों में प्रत्यय लागकर जो धातुएँ बनती हैं, वे नाम धातुएँ बनती हैं। इन नाम धातुओं से बनने वाले क्रियारूप नामिक क्रियाकहलाते हैं या कहे जाते हैं, जैसे

(क)-संज्ञा शब्दों से बनने वाली नामिक क्रियाएँ

 शरम- शरमाना, रंगक- रंगना, लाज- लजाना, टक्कर- टकराना, लालच-ललचाना, हाथ – हथियाना, आलस- अलसाना , लात- लतियाना, बात – बतियाना ,फिल्म -फिल्माना, दर्शन -दर्शाना, चक्कर -चकराना  इत्यादि ।

 () सर्वनाम शब्दों से बनने वाली नामिक क्रियाएँ अपना – अपनाना

 (ग)  विशेषण शब्दों से बनने वाली नामिक क्रिया – गरम-  गरमाना, लंगड़ा –लँगड़ाना,साठ-सठियाना इत्यादि ।


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समापिका तथा असमापिका क्रियाएँ:

समापिका क्रिया

सरल वाक्य में जो क्रिया वाक्य को समाप्त करती है और प्राय: वाक्य के अंत में रहती है, उसे समापिका क्रिया कहते हैं, जैसे

  • एका मोहन डॉक्टर है।
  • एक लड़का पढ़ता है।
  • मैं निबंध लिगा।

इन वाक्यों में है, पढ़ता है, लिखूँगा, क्रिया पर वाक्य के अंत में हैं। इनका संबंध व्याकरणिक कर्ता से है।

असमापिका क्रिया :  

वाक्य में जो क्रिया विधेयगत क्रिया के स्थान पर प्रयुक्त न सेकर अन्य स्थान पर प्रयुक्त होती है, उसे असमापिका क्रिया कहते हैं। इन्हें कृदंती रूप भी कहा जाता है। यह क्रिया समापिका क्रिया के लिए निर्धारित स्थान पर प्रयुक्त है, जैसे-

  • मोहन ने घर आकर भोजन किया।
  •  बड़ों के कहने पर चला करो।
  •  मेज पर पड़ी /रखी किताब उठा लाओ।

 इन वाक्यों में आकर, कहने पर, पड़ी / रखी असमापिका क्रियाएँ (कृदंत) है।


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 कृदंत

 कृदंत मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-

  • अपूर्ण कृदंत – खिलता फूल, बहती नदी, चलती गाड़ी इत्यादि ।
  •  पूर्ण कृदंत – बैठा (हुआ) आदमी, पका (हुआ) फल, लिखा हुआ पत्र इत्यादि ।
  • क्रियार्थक कृदंत पढ़ने के लिए, खेलने के लिए, सोने के लिए इत्यादि।
  • पूर्वकालिक कृदंत – बैठकर, खड़े होकर, खाकर, दौड़कर इत्यादि ।
  • कृदंतीय संज्ञा (क्रियार्थक संज्ञा) – टहलना, उठना, बैठना, दौड़ना, पढ़ना इत्यादि।
  • कृदंतीय क्रिया विशेषणगिरते– पड़ते, चलतेचलते, लेटे लेटे इत्यादि ।
  • कर्तृवाचक कृदंत – भागने वाला, दौड़ने वाला, जाने वाला ,आने वाला , बोलने वाला  इत्यादि
  • तात्कालिक कृदंतआते ही , बैठते ही , लेटते ही, पहुंचते ही, देखते ही इत्यादि। अपूर्ण पूर्ण तथा कर्तृवाचक कृदंत प्रायः विशेषण होते हैं तथा पूर्वकालिक कृदंत प्रायः क्रिया विशेषणों के रूप में प्रयुक्त होते हैं।

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रंजक क्रिया- (संयुक्त क्रिया)

 वाक्य में क्रिया पद  / पदबंध के भीतर एक से अधिक क्रियाएँ भी आती हैं, जैसे-

  • दिखाई दिया।
  • बैठ जाओ।
  • लौट आया।
  • चल पड़ा।

उपर्युक्त क्रिया पद/ पदबंध, संयुक्त क्रिया की श्रेणी में आते हैं  इनमें प्रयोग किये गए “दिखाई, बैठ, लौट और चल”  क्रियाएँ मूल क्रियाओं को दर्शाता है, जो कोशीय अर्थ प्रदान करतीं हैं । उक्त क्रियाओं में “दिया, जाओ, आया तथा पड़ा” क्रियाएं रंजक क्रियाएं हैं, जो कोशीय अर्थ को रंजित करती है अर्थात विशेष अर्थच्छाया देती हैं।

इस प्रकार दो स्वतंत्र अर्थ देने वाली क्रियाएँ जब मुख्य क्रिया और रंजक क्रिया के रूप में एक साथ मिलजाती है, सब उन्हें रंजक क्रिया कहलाती हैं।

 रंजक क्रिया ही संयुक्त क्रिया कहलाती हैं; जैसे-

  • उसे मोहन आता दिखाई दिया । ( देना पूर्णता का भाव)
  •  तुम यहाँ आकर बैठ जाओ। (जानापूर्णता का भाव )
  • वर्षा के कारण वह बीच में ही चला आया (आना– अनायासता का भाव) 
  • वह विद्यालय की ओर चल पड़ा। (पड़ना -शीघ्रता का भाव)
  • बच्चा खेलने लगा। (लगना -आरंभ का भाव )
  • आनंद चिल्ला उठी । (उठना – आकस्मिकता का भाव)
  •  उसने कुत्ते को मार डाला। (डालनाबलात का भाव)

 इन वाक्यों में देना, जाना, आना, पड़ना, लगना, उठना और डालना सभी रंजक क्रियाएँ हैं।

रंजक क्रिया या संयुक्त क्रिया भी दोक्रियाओं के योग से बनती है, लेकिन मुख्य क्रिया का अर्थ केवल पहली क्रिया द्वारा बताया जाता है, जैसेचल देना, आजाना, कर लेना इत्यादि। ये क्रिया रूप क्रमश: चलना-देना, आनाजाना तथा करना- लेना  के संयोग से बने हैं। इनमें पहली क्रिया ही पूरे पद को अर्थ प्रदान करती है।  

अब प्रश्न उठता है कि इन संयुक्त क्रियाओं में दूसरी क्रिया क्या काम करती है ?

 वास्तव में यह दूसरी क्रिया अपना अर्थ त्याग (छोड़) देती है तथा पहली क्रिया के अर्थ में तरहतरह के रंग भरने (रंजन करने ) का काम करती है। कहीं तो यह मुख्य अर्थ को बढ़ाती है, तो कहीं पटाती है कहीं अर्थ को विस्तार देती है, तो कहीं अर्थ को संकुचित कर देती है ठीक उसी तरह से जिस तरह से एक चित्रकार अपने चित्र में रंगों के द्वारा चित्र के किसी अंश को उभारता है तो किसी अंश को दबाता है। इसी प्रकार रंजन करने के कारण इस क्रिया को रंजक क्रिया कहा जाता है।

सहायक क्रिया ( काल, वृत्ति, पक्ष, वाच्य आदि ) के प्रत्यय भी इस रंजक क्रिया में ही जुड़ते हैं। इसलिए रंजक क्रिया को संयुक्त क्रिया कहा जाता है, जैसे

  • मैंने किताब खरीद ली। (खरीदना होना = खरीदरी)
  • आप बाहर निकाल जाइए। (निकलिए )
  • मोहन घर आ गया है । (आया है)
  • मैंने काम कर लिया है। (किया है)

हिंदी में कुछ संयुक्त क्रियाओं की रचना कभीकभी दो रंजक क्रियाओं के योग से भी होती है, जैसे

वह रोज शाम की मेरे यहाँ आ जाया करता था । ( आना + जाना + करना )

कभीकभी फिल्म देख लिया करता था। (देखना + लेना + करना)

संयुक्त क्रियाओं के अन्य लक्षण :

1.कहींकहीं संयुक्त किया के दोनों पदों का क्रम तथा रूप बदलने पर अर्थ में परिवर्तन भजाता है । जैसे –

  • उसने उसे मार दिया (जान से मार देना)
  • उसने उसे दे मारा (उठाकर नीचे पटक देना)

 2. निषेधात्मक वाक्यों में मुख्य क्रिया के साथ रंजक क्रिया नहीं लगती। जैसे-

  • उसे मुख लग आई ।उसे भूख नहीं लगी।
  • यह सुनकर मोहन चिल्ला उठा।— यह सुनकर मोहन नहीं चिल्लाया |

3. संयुक्त क्रिया में सकना और चुकनाजैसी क्रियाएँ रंजक क्रियाओं के रूप में प्रयुक्त होती हैं। वास्तव में ये रंजक कियएँ नहीं है और न ही इनका कोई स्वतंत्र अर्थ होता है, किंतु ये मुख्य क्रिया के साथ जुड़कर क्रिया की सामर्थ, पूर्णता इत्यादि का बोध कराती हैं, जैसे – () रमेश यह काम कर सकता है। (सामर्थ्य) () शीला मुंबई जा चुकी है। (पूर्णता का भाव)


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मिश्र क्रिया 

 संयुक्त क्रिया की रचना दो क्रिया धातुओं से मिलकर होती है, लेकिन मिश्र क्रिया में पहला अंश तो संज्ञा, विशेषण या क्रिया विशेषण का होता है तथा दूसरा अंश क्रिया का होता है। क्रिया वाले अंश को क्रियाकर कहा आता है। सहायक क्रिया के प्रत्यय क्रियाकर में ही जुड़ते हैं। मिश्र क्रिया के निम्नलिखि उदाहरण देख सकते हैं

संज्ञा – स्मरण +करना= स्मरण करना, दर्शन करना, प्यार करना, कष्ट देना, दान देना, याद आना, भूख लगना इत्यादि।

विशेषणअच्छा+लगना ,अच्छा लगना, बुरा लगना, प्यास लगना,सुंदर दिखना, मूर्ख दिखना इत्यादि ।

क्रिया विशेषणबाहर + करना = बाहर करना, भीतर करना, अंदर करना इत्यादि।

अनुकरणात्मक क्रियाएँ

हिंदी में कुछ क्रिया रूप ऐसी धातुओं से बनते हैं, जो ध्वनियों के अनुकरण पर बनती हैं। ऐसी क्रियाओं को अनुकरणात्मक क्रिया कहा जाता है, जैसे-

  • हिन् + हिन् = हिनहिनाना 
  • थर + थर = थरथराना 
  • लप + लप = लपलपाना
  • बड़ + बड़ = बड़बड़ाना 
  • थप + थप = थपथपाना
  • सन + सन = सनसनाना
  • झन + झन = झनझनाना

अभ्यास के लिए प्रश्न –

  1. मैं तुम्हारा नाम जानता हू।
  2. शेखर कार में चलता है।
  3. माली ने मुझे आम खिलाए।
  4. रीता कहानी सुनती है।
  5. वह चपरासी से सफाई करवा रहा है।
  6. तुमने अपने मित्र को मेरी कविता सुनाई।
  7. जवाहरलाल नेहरू भारत के प्रधानमंत्री थे।
  8. आज माँ ने पकवान बनाए।
  9. उसने मेरी पुस्तक ले ली।
  10. वह सर्दी से कँपकँपा रहा है।
  11. अफसर कर्मचारी को वेतन देता है।
  12. सेवक नदी से घड़ा भरता है।
  13. विजय ने लता को पत्र लिखा।
  14. लता स्कूल में पढ़ती है।
  15. यह कमीज़ कहाँ सिलवाई?
  16. ऊँट दौड़ रहा है।
  17. माँ बालक को दूध देती है।
  18. लता ने खाना खिलवाया।
  19. बालिका स्कूल जाती है।
  20. बालक पत्रिका पढ़ता है।
  21. दादी ने कहानी सुनाई।
  22. रीता घर आती है।
  23. मैंने उसे अपने मित्र से मिलवाया।
  24. मामा ने मुझे साड़ी दी।
  25. बच्चे गेंद खेल रहे हैं।
  26. माँ लड़की को खाना देती है।
  27. मैं ड्राईवर से गाड़ी चलवाता हूँ।
  28. टायर घिस गया।
  29. वह खाना खा रही है।
  30. दुकानदार ने विद्यार्थी को पुस्तक दी।
  31. वह मोहन से मिठाई मँगवाता है।
  32. बहू शर्माती है।
  33. अजय कहानी पढ़ रहा है।
  34. उसने अपने साथी को पूरा पता बताया।
  35. उसने नौकर से अपना सामान मँगवाया है।

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