HINDI BHASHA

हिन्दी भाषा का परिचयात्मक वर्णन 

हिन्दी भारतीय आर्य भाषा परिवार की भाषा है। संस्कृत भाषा से लेकर पालि प्राकृत, अपभ्रंश आदि सोपानों से गुजरती हुई आज संपूर्ण भारत की संपर्क भाषा बन गई है। HINDI BHASHA हिन्दी भाषा का विकास अंताक्षेत्रीय भाषा, राष्ट्रभाषा, राजभाषा और अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में हो रहा है।

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हमारे जन-जीवन, सामाजिक, सांस्कृतिक संप्रेषण ज्ञान-विज्ञान और सृजनात्मक साहित्य की भाषा के रूप में विकसित हिन्दी भाषा हमारी ही नहीं अपितु पूरे विश्व की शिक्षा व्यवस्थाओ में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर चुकी हैं।

इसी का परिणाम है कि हिन्दी भाषा अपने देश में मातृभाषा प्रथम भाषा, दूसरी भाषा आदि रूपों में पढ़ी और पढाई जा रही है तथा यह भारत से बाहर अनेक देशों में भी अध्ययन और अध्यापन हो रहा है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सन् 1952 में हिन्दी भाषा HINDI BHASHA को भारत की राजभाषा होने का गौरव प्राप्त हुआ | उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तरांचल, झारखंडता इत्तीसगढ़ राज्यों और दिल्ली एवं अंडमान सत्य राज्य-क्षेत्रों में शासन और शिक्षा की भाषा हिन्दी HINDI BHASHA ही है।

हिन्दी भाषा के विकास का सामान्य ऐतिहासिक इस  प्रकार है-

भारतीय आर्य भाषाओं में हिन्दी भाषा का प्रमुख स्थान है। हिन्दी भाषा HINDI BHASHAका ऐतिहासिक परिचय प्रस्तुत करने के लिए हमें भारतीय आर्यभाषा के विकास पर नजर डालना आवशयक है।

वैदिक साहित्य से लेकर आज तक का इतिहास हमें भारतीए  आर्य भाषा के विकास को जानकारी देता है। इसी विकास के क्रम की दृष्टि से भारतीय आर्य भाषा को तीन रूपों में तथा कालों में बाँटा जा सकता है

(1) प्राचीन आर्य भाषाएँ (2000 ईसा पूर्व  से 500 ईसा पूर्व तक )

(2) मध्य कालीन भारतीय आर्य भाषा (ईसा पूर्व 500 से 1000 ईसा पूर्व तक)

(3) आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएं (1000 ईसवी से अब तक )

क) प्राचीन भारतीय आर्य भाषा-

जब आर्य  भारत में आए थे तब आर्यों को अपनी सभ्यता के विकास के लिए यहाँ की प्रवृति और लोगों के साथ युद्ध करना पड़ा । उन्होंने यहाँ के जंगलों को साफ करक यज्ञ प्रधान संस्कृति का विकास किया तथा ऋग्वेद की ऋचाओं की रचना की थी।

वेदों की इस भाषा को ‘छादस’ नाम दिया गया था। धीरे – धीरे जनपदों का विकास हुआ और इन जनपदों की बोलियों में भी अंतर दिखाई देने लगा था। वेदो की ऋचाओं की भाषा में एक रूपता लाने के लिए भाषा को परिमार्जित करने और सुसंस्कृत करने की आवश्यकता महसूस की गई ।

HINDI BHASHA, भाषा को स्थिर करने के लिए इसको व्याकरण के नियमों में बांधा गया। महर्षि पाणिनि में लगभग 500 ईसा पूर्व अष्टा ध्यायों की रचना की। यही परिमार्जित सुसंस्कृत, नियमबद्ध भाषा संस्कृत कहलाई।

बोलचाल की भाषा का विकास भी अपनी गति से चलता रहा। इस समय के आर्यों के विभिन्न जनपदों की बोलियों में भी अंतर अन्तर आने लगा था। लेकिन इन बोलियों  पृथक नामकरण नहीं हुआ था | महर्षि पारिणी ने उनके इस अंतर का उल्लेख करते हुए इनको ‘प्राच्य’ ‘प्रतीच्य और दक्षिरतया नाम दिए थे।

(2) मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषाएँ

इस समय तक साहित्यिक मत संस्कृत और लोकभाषाओं में काफी अंतर आ चुका था। भगवान बुध और महावीर ने अपने उपदेशों को लोकभाओं में देना उचित समझा। वे दोनों पूर्वी जनपदों के रहने वाले थे।

इसलिए उन्होंने अपने अपने उपदेशों को क्रमश: मगध और कौशल को जनपदीय भाषाओं में संग्रहीत कराया था । बौद्ध धर्म के प्रचार के साथ साथ जनपद की भाषा को भाषा बनने का मौका मिला।

यही भाषा मौर्या साम्राज्य की राजभाषा बना। सम्राट अशोकाने इसी भाषा में अपने शिलालेखा खुदवाए। इसी से पालि भाषा का विकास हुआ। धीरे धीरे पाली  भाषा भी साहित्यिक भाषा बनाकर रूढ़ हो गई और इधर बोलचाल की भाषाएं भी स्वतंत्र रूप से विकसित होती रही।

इस समय एक जनपदीय बोलियों में काफी अंतर आ  चुका था। अब इन जनपदीय भाषाओं को नाम मिल गए थे। इस काल की भाषा का नाम प्राकृत है। विदवान लोग भौगोलिक दृस्टि से प्राकृत के प्रमुख से ये पांच स्थानीय रूप मानते हैं।

  •  मागधी प्राकृत  ( मगध और उसके पूर्वी प्रदेशों की भाषा )
  • अर्ध मागधी प्राकृत  ( कौशल जनपद की भाषा )
  • शौरशानि प्राकृत  ( पूर्वी पंजाब, राजस्थान,  हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की भाषा )
  • महाराष्ट्री प्राकृत ( पश्चिमी राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र की भाषा )
  • पैसाची प्राकृत ( उत्तर पश्चिम भारत और पूर्वी पाकिस्तान )

इन पाँचों प्राकृतों में से पहली दूसरी और तीसरी प्राकृतों का संबंध हिन्दी प्रदेश की उपशाखाओं तथा बोलियों से है। ईसा की पांचवी सती तक यह काल ‘प्राकृत काल माना जाता है।”

यह मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषाओं के विकास का यह दूसरा चरण है। इस सती में में एक शक्तिशाली गुर्जर जाति ने भारत में प्रवेश किया इस जाति के लोगों ने उत्तर भारत के पश्चिम, मध्य और पश्चिमोत्तर भाग पर कब्जा कर लिया था।

इन लोगों के प्रभाव से वहाँ की जनपदीय भाषा प्राकृत में काफी अंतर और परिवर्तन आगया था। इसी परिवर्तित लोक भाषा को अपभ्रंश का नाम दिया गया। मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषा के इस काम को अपभ्रंश काल कहा गया है तथा इसे मध्य कालीन भारतीय आर्य भाषा के विकास का तीसरा चरण माना जाता रेखा

३। आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ

दसवीं ग्यारहवीं शताब्दी में आकर आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का विकास या उदय होता है। इस समय तक अपभ्रंश भी साहित्यिक भाषा चुकी थी और बोल-माल की भाषाओं में भी काफी अंतर आने लगा था। अपभ्रंश के स्थानीय रूप से आधुनिक आर्य भाषाओं का विकास हुआ।

ब्राचड़ अपभ्रंश से सिंधी , केकय अपभ्रंश से लहन्दा, पैशाची की अपभ्रंश के खस रूप से पहाड़ी हिन्दी की बोलियों, अर्धमागधी प्राकृत से पूर्वी हिन्दी वर्ग की बोलियों, मागधी प्राकृत के पश्चिमी रूप से बिहारी हिन्दी की बोलियों मागधी प्राकृत के पूर्वी रूप से बंगला, असमिया और उड़िया, शौरसेनी अपभ्रंश से पश्चिमी हिन्दी की बोलियों, महाराष्ट्री प्राकृत से मराठी, कोंकणी, नागरअपनश से पश्चिमी राजस्थानी और गुजराती का विकास हुआ।

HINDI BHASHA

हिन्दी क्षेत्र की उपभाषाएँ और उनकी बोलियाँ 

सामान्य रूप से हिन्दी भाषी क्षेत्र में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान दिल्ली, उत्तराखंड, झारखंड तथा छत्तीसगढ़ में बोली जाने वाली भाषाओ और बोलिओं को हिन्दी HINDI BHASHA के अंतर्गत माना जाता है।

इसी क्षेत्र को ही सामान्य रूप से हिन्दी प्रदेश कहा जाता है तथा इस क्षेत्र में बोली जानेवाली सभी बोलियाँ हिन्दी की बोलियाँ मानी जाती है। भाषा वैज्ञानिक तथा विद्वान् हिन्दी प्रदेश की बोलियों / भाषाओं को पाँच उपभाषा में बाँटते हैं। ये पांचों उपभाषा वर्ग इस प्रकार हैं

1.पश्चिमी हिन्दी उपभाषा वर्ग –

भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से हिन्दी के अंतर्गत दो -दो वर्ग माने गए हैं। पश्चिमी हिन्दी और पूर्वी  हिन्दी भाषा  वर्ग । हिन्दी क्षेत्र के पश्चिमी भाग  में स्थित कुछ बोलियों को यह सामूहिक नाम दिया गया था । परिचमी हिन्दी उपभाषावर्ग के अंतर्गत खड़ी बोली (कौरवी ), हरियाणाती (बांगरू) ब्रज कन्नौजी और बुन्देलो को रखा गया है।

कुछ विद्वान इसमें ‘निमारी’ को भी इस वर्ग में रखते हैं। इस प्रकार पश्चिमी हिन्दी उपभाषा वर्ग में छह बोलियाँ आती है। भौगोलिक दृष्टि से पश्चिमी हिन्दी उपभाषा वर्ग पंजाबी, राजस्थानी, पहाड़ी, पूर्वी हिन्दी और मराठी भाषाओ से घिरा हुआ है।

2.पूर्वी हिन्दी उपभाषा वर्ग –

हिन्दी प्रदेश के पूर्वी भाग में बोली जाने वाली बोलियों के संग्रह के लिए जॉर्ज गृहरसन द्वारा ‘पूर्वी हिन्दी ‘ नाम दिया गया है। इस क्षेत्र में मुख्य रूप से तीन बोलियो अवधी, छत्तीस गढी तथा बघेली बोली जाती हैं। इन गोलियों में अवध अधिक महत्वपूर्ण है।

तुलसीदास ने राम चरित मानस की रचना इसी अवधी में की है। ऐतिहासिक दृष्टि से पूर्वी हिन्दी का विकास अर्थ मागधी अपभ्रंश से माना गया है। पूर्वी हिन्दी क्षेत्र में मुख्य रूप से  का प्रयोग हो नगरी लिपि का प्रयोग होता है। कुछ लोगों में कैथी लिपि भी प्रचलित है।

3. बिहारी हिन्दी उपभाषा वर्ग –

बिहारी उपभाषा वर्ग की बोलियों बिहार तक ही सीमित नहीं हैं। ये पूरे बिहार और उत्तरप्रदेश के बलिया, गाजीपुर, पूर्वी फैजाबाद, पूर्वी जौनपुर, आजमगढ़. नजारस देवरिया तथा गोरखपुर आदि जिलों में भी बोली जाती हैं।

बिहारी उपभाषा वर्ग को दो वगों में विभाजित किया जा सकता है, पूर्वी बिहारी और पश्चिमी बिहारी । पूर्वी बिहारी के अंतर्गत मैथिलि और मगही आती है तथा पश्चिमी बिहारी के अंतर्गत भोजपुरी आती है। बिहारी की बोलियों में मुख्य रूप से मैथिली में साहित्य की रचना हुई है। विद्यापति मैथिली के आदि कवि  माने जाते हैं।

4. राजस्थानी हिन्दी उपभाषा वर्ग-

राजस्थानी में प्रयुक्त होने वाले भाषा  रूपों तथा बोलियों के लिए सामूहिक नाम है। राजरथान में यह क्षेत्र चारों ओर से सिंधी व लहन्दा,पंजाबी, बांगरू,बज, मराठी और गुजराती से घिरा हुआ है। जॉन ग्रियर्सन से राजस्थानी बोलियों को पांच वर्गों में विभाजित किया है –

  1. पश्चिमी राजस्थानी मारवाड़ी
  2.  उत्तर पूर्वी राजस्थानी – अहीरवाटी , मेवाती
  3. मद्य पूर्वी राजस्थानी – ढूंढारी ( जयपुरी ), किशनगरी , अजमेरी
  4. दक्षिणी राजस्थानी – निमाड़ी
  5. दक्षिणी पूर्वी राजस्थानी – मालवी

साहित्यिक दृस्टि से राजस्थानी का सम्बन्ध शौरसेनी के एक रूप नागरी अपभ्रंश से मन जाता है। छपाई में नागरी लिपि का प्रयोग होता है तथा बहीखाते के काम के लिए महाजनी लिपि का प्रयोग होता है।

5. पहाड़ी हिंदी उपभाषा वर्ग –

पहाड़ी प्रदेश में बोली जाने के कारण इसे पहाड़ी हिंदी कहा जाता है। यह उपभाषा वर्ग हिमाचल प्रदेश में भद्रवाह के उत्तर – पश्चिम से लेकर नेपाल तक पूर्वी भाग तक फैला हुआ है। मुख्या रूप से तीन रूप मने गए है –

  1. पश्चिमी पहाड़ी – जौनसारी, सिरमौरी, चमेआली, भद्रवाही आदि
  2. मद्य पहाड़ी ( कुमाउनी, गढ़वाली )
  3. पूर्वी पहाड़ी ( नेपाली )

हिंदी प्रदेश की बोलियों का विचार करते समय पहाड़ी बोलियों में से नेपाली का विचार नहीं किया जाता। केवल मद्य और पश्चिमी पहाड़ी हिंदी पर ही विचार करते हैं। ऐतिहासिक दृस्टि से पहाड़ी हिंदी उप भाषावर्ग बोलिओं तथा भाषाओँ का ‘ खस’ अपभ्रंश से मन जाता है ।

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हिंदी की बोलियॉं 

हिंदी प्रदेश को पांच उपभाषा वर्ग में विभाजित किया गया है –

  • पश्चिमी हिंदी
  • पूर्वी हिंदी
  • बिहारी हिंदी
  • राजस्थानी हिंदी
  • पहाड़ी हिंदी

प्रत्येक HINDI BHASHA भाषा उपवर्ग की बोलियों का परिचय इस प्रकार है –

i.पश्चिमी हिन्दी की बोलियाँ

पश्चिमी हिन्दी के अंतर्गत बज कन्नौजी, कौरवी , बुन्देली, बांगरू और निमाड़ी हैं। इन बोलियों का क्षेत्र और सीमाओं का परिचय निम्नलिखित है-

a.ब्रजभाषा

ब्रजभाषा पश्चिमी हिन्दी उपभाषा वर्ग की प्रमुख बोली है। ब्रज वास्तविक रूप से एक बोली है लेकिन सोलहवीं से  उन्नीसवीं शताब्दी तक यह हिंदी प्रदेश की साहित्यिक भाषा होने के कारण यह भाषा कहलाने लगी ।

HINDI BHASHA -हिंदी के प्रसिद्ध सूरदास, नन्ददास, बिहारी, देव, भूषण, भारतेन्दु तथा रत्नाकर आदि ने इसी बोली या भाषा में काव्य की रचना की है ।

ब्रजभाषा उत्तर प्रदेश के आगरा अलीगढ़, एटा, मथुरा, मैनपुरी, बुलन्दशहर, बदायूं, बरेली, हरियाणा के गुड़गाँव, राजस्थान के धौलपुर, भरतपुर, जयपुर के पूर्वी भाग और मध्य प्रदेश के ग्वालियर में बोली जाती है। शुद्ध या परिनिष्ठित रूप  में ब्रज, आगरा, मथुरा और ग्वालियर के कुछ भागो में बोली जाती हैं।

ब्रजभाषा के तीन रूप है-

1) पूर्वी बज (मैनपुरी, एटा, बदायूँ, बरेली, हरदोई और कानपुर का कुछ भाग)

2) पश्चिमी ब्रज (मथुरा, आगरा, अलीगढ़ और बुलन्दशहर)

(3) दक्षिणी ब्रज ( धौलपुर, भरतपुर, करौली, पश्चिमी ग्वालियर , पूर्वी जयपुर

ऐतिहासिक दृस्टि से ब्रजभाषा का सम्बन्ध शौरसैनी अपभ्रंश से है।

b. कन्नौजी

कन्नौज का क्षेत्र इटावा, फरुखाबाद, शहजहाँपुर, कानपुर, हरदोई और पीलीभीत हैं। कन्नौजी और ब्रजभाषा  में बहुत समानता है। कन्नोजी, इटावा और फर्रुखाबाद के दोआब  में और शाहजहांपुर में गंगा के उत्तर में प्रयुक्त होती हैं। कन्नौजी जो अपनी सीमाओं पर चारों ओर से ब्रज, अवधी, नेपाली और कुमाउईनी  से घिरी  हुई है।

c.  कौरवी

कौरवी रामपुर, मुरादाबाद, बिजनौर मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, देहरादून और पटियाला के पूर्वी भाग में प्रयुक्त होता है। कौरवी का छेत्र बांगरू, ब्रज और पहाड़ी के बीच पड़ता है। बिजनौर की कौरवी परिनिष्ठित मानी जाती है।

कुछ विद्वान इसे से कहते हैं, लेकिन खड़ी बोली हिंदी कहते हैं लेकिन खड़ी बोली का वर्त्तमान स्वरूप को दृष्टि में रखते हुए कौरवी और खड़ी बोली में अंतर है।

d. बुंदेली

बुन्देलखंड में बोली जाने के कारण इसे बुन्देली कहा जाता है। यह उत्तर प्रदेश में हमीरपुर, जालौन, झांसी तथा मध्य प्रदेश में ग्वालियर भोपाल, सागर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, और ओरछा जिलों में बोली जाती है ।

मध्यप्रदेश में दलिया, पन्ना, दमोह बालावाट, हिंदबारा में मिश्रित रूप में मिलता है। बुन्देली का परिनिष्ठित रूप सागर और ओरछा में मिलता है। बुंदेली अपने चारों ओर अवधी मराठी, राजस्थानी और बजभाषा से घिरी हुई है। बुन्देली का विकास शौरसेनी अपभ्रंश के दक्षिणी रूप से हुआ है।

e. हरियाणवी (बांगरू)

हरियाणवी  दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्र, हरियाणा में करनाल, रोहतक, हिसार, जींद और पंजाब में पटियाला और नाभा में बोली जाती है। हरियाणवी का क्षेत्र चारों ओर से खड़ी बोली (कौरवी), पंजाबी, अहीरबाटी और मारवाड़ी से घिरा हुआ है।

f. निमाड़ी

निमाड़ी का क्षेत्र मध्यप्रदेश में खंडवा निमाड़ और खरगौन नामक प्रदेश है। जॉर्ज ग्रियसन ने निमाड़ी को हिन्दी की राजस्तानी उपभाषा वर्ग के अंतर्गत आता है, लेकिन अनेक विद्वान इसे पश्चिमी हिन्दी उपभाषा वर्ग में रखते हैं। परिनिष्ठित निमाड़ी खंडवा और खरगौन के बीच बोली जाती है। निमाड़ी प्रदेश अपने चारों ओर से मालवी , मराठी, बुन्नेलो और भीली से घिरा हुआ है।

ii.पूर्वी हिन्दी की बोलियाँ

पूर्वी हिन्दी की बोलियाँ १। अवधी २। छत्तीसगड़ी तथा ३। बघेली  है। इन तीनों बोलियों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है- HINDI BHASHA

a.अवधी

अवधी उत्तर पदेश में फतेपुर, इलाहबाद, जौनपुर और मिजापुर के कुछ भाग,  फैजाबाद, गौंडा, बहराइच सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, कानपुर के कुछ भाग और नेपाल की तराई में बोली जाती है।बुन्देली और कन्नौजी पूर्व में भोजपुरी, दक्षिण में छत्तीसगढ़ी और उत्तर में नेपाली बोली जाती है।

अवधी के तीन उपरूप है- पश्चिमी अवधी, केन्द्रीय अवधि और पूर्वी अवधी । पश्चिमी अवधी में कन्नौजी का कुछ प्रभाव है तथा पूर्वी अवधी भोजपुरी से प्रभावित है। केन्द्रीय अवधी बाराबंकी बहराइच और रायबरेली में बोली  जाती है। यही अवधी परिनिष्ठित मानी जाती है।

b. छत्तीसगढ़ी

छत्तीसगढ़ी रामपुर, बिलासपुर, रायगढ़, संभलपुर पश्चिमी आग, कौवोट मंदगाँव, बस्तर तथा बिहार के कुछ भागों में बोली जाती है। बिलासपुर की छत्तीसगढ़ी परिनिष्ठित मानी जाती है। संभलपुर की छत्तिसगरी उड़िया से प्रभावित है। सरगुजा की छत्तीसगढ़ी पर छोटा नागपुर और रांची की मगही से प्रभावित है। उत्तर में छत्तीसगढ़ी की सीमा पर भोजपुरी और दक्षिण में गराठी है।

c.बधेली

बधेली बघेलखण्ड में बोली जाती है। बोली का केन्द्र रीवा है। इसके अतिरिक्त बघेली  दमोह, जबलपुर, मंडला, बालाघाट  बाँदा, फतेहपुर, तथा हमीरपुर के कुछ आगों में भी बोली जाती है। बोली का क्षेत्र अवधी, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी मराठी और बुन्देली से घिरा हुआ है। बघेली की कई उपबोलियाँ हैं जिनमें तिराहारी, बनाफरी, पावरी, गोंडवानी ओझी आदि प्रमुख हैं।

iii.बिहारी हिन्दी की बोलियाँ

बिहारी उपभाषा वर्ग को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है। पूर्वी बिहारी के अंतर्गत मगही, मैथिली और पश्चिमी बिहारी के अंतर्गत भोजपुरी है। बिहारी बोलियों में साहित्य रचना प्रमुख रूप से मैथिली में हुई है। बिहारी बोलियों का विकास मागधी अपभ्रंश के पश्चिमी रूप से मानी जाती है। बिहारी हिन्दी को इन बोलियों परिचय इस प्रकार है-

a.मगही

मगही गया, पटना, हजारी बाग, मुंगेर पालामऊ, भागलपुर और राँची के कुछ भागों में बोली जाती है। गया की मगही परिनिष्ठित मानी जाती है। मगही की सीमा पर उत्तर-पूर्व में मैथिली, दक्षिण में ओड़िआ, दक्षिण पूर्व में बंगला और पश्चिम में भोजपुरी है। मगही में काफी लोकसाहित्य है।

b. मैथिलि

मैथिलि का क्षेत्र बिहार के उत्तर भाग में चंपारन, मुज्जफरपुर, मुंगेर, भागलपुर, दरभंगा, पूर्निया तथा उत्तरी संभल परगना हैं। इसके अतिरिक्त मैथिली माल्दा, दिनाजपुर भागलपुर, तिरहुत, बीजक की सीमा के पास नेपाल को तराई में भी बोली जाती है। साहित्यिक दृष्टि से मैथिली का विशेष महत्व है। मैथिली के प्रसिद्ध कृति विद्यापति बँगला तथा हिन्दी की भी विभूति माने गए हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से मैथिली का विकास मागधी अपभ्रंश के केन्द्रीय या मध्य रूप से जाना जाता है।

c.भोजपुरी 

भोजपुरी बिहार में सारन, चंपारण, रांची, पालामऊ आदि जिलों में तथा उत्तर प्रदेश में बनारस, गाजीपुर, बलिया, जौनपुर, मिर्जापुर, गोरखपुर, आजमगढ़ और बस्ती जिलों में बोली जाती है। भोजपुरी की सीमाओं पर पूर्व में मैथिली और मगही, दक्षिण में उड़िया, उत्तर में नेपाली और पश्चिम में अवधी बोली जाती है। भोजपुरी का दक्षिणी उपरुप  सरन, बलिया और गाजीपुर में बोला जाता है व् परिनिष्ठित रूप माना जाता है। भोजपुरी की उत्पत्ति पश्चिमी मागधी या मागधी अपभ्रंश के पश्चिमी रूप से मानी जाती है। लोकसाहित्य की  दृष्टि से भोजपुरी संपन्न है।

iv.राजस्थानी हिन्दी उपभाषावर्ग की बोलियाँ

राजस्थानी भाषा वर्ग की प्रमुख बोलिया है – मारवाड़ी, ढूंढारी, हाड़ौती, मेवाती तथा मालवी  है। इन सबका संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित हैं – HINDI BHASHA

a.मारवाड़ी

मारवाड़ी पश्चिमी राजस्थान की प्रमुख बोली है। मारवाड़ी का क्षेत्र मारवाड़, मेवाह, पूर्वी सिंध, जैसलमेर बीकानेर, दक्षिणी पंजाब और जयपुर का उत्तरी-परिचमी भाग है। परिनिष्ठित मारवाड़ी मारवाड़ में बोली जाती है। मारवाड़ी के चार प्रमुख रूप हैं- पूर्वी मारवाड़ी, पश्चिमी मारवाड़ी, उत्तरी मारवाड़ी तथा दक्षिण मारवाड़ी। मारवाड़ी की बहुत से उपबोलियाँ है। इन उपबोलियो में मेवाड़ी, सिरोही, थली, शेखावाटी और बागड़ी उल्लेखनीय है ।

b.ढूंढारी (जयपुरी) 

ढूंढारी मध्य पूर्वी राजस्थान की बोली है। ढूंढारी प्रदेश शेखावाटी और जयपुर के बीच में है। इसी आधार पर इसका नाम ढूंढारी पड़ा था। ढूंढारी का परिनिष्ठित रूप जयपुर में बोला जाता है। ढूंढारी की पाँच उपबोलियाँ  है ।

c.हाड़ौती

हाड़ौती भी मध्य पूर्वी राजस्थान की बोली है जो बूँदी, कोटा और उसके आस-पास बोली जाती है। शिवपुरी हाड़ौती के स्थानीय रूप है। ग्वालियर के लोग हाड़ौती के इस रूप को शिवपुरी कहते हैं। कोटा के आसपास यह सियाड़ी कहलाती है।

d.मेवाती

मेवाती उत्तरी पूर्वी राजस्थान की प्रमुख बोली है।  मेवाती पर पश्चिमी हिन्दी का काफी प्रभाव है। मेवाती का क्षेत्र अलवर, भरतपुर तथा गुड़गाँव है।

e.मालवी 

मालवी दक्षिण पूर्वी राजस्थान की प्रमुख बोली है। उज्जैन, इन्दौर और देवास शुद्ध मालवा के क्षेत्र है। मालवी अपने चारों ओर से जयपुरी, मेवाडी, गुजराती, खानदेशी, मराठी और बुन्देली से घिरी हुई है।

v.पहाड़ी उप भाषा वर्ग को बोलियाँ

पहाड़ी उप भाषा वर्ग को बोलियाँ है- गढवाली, कुमाउनी, सिरमौरी, जौनसारी, चेमेआली आदि। इनमें से गढ़वाली और कुमाउँती प्रमुख बोलियाँ हैं। कुमाउनी और गढ़वाली का परिचय इस प्रकार है।

a.कुमाउनी

कुमाउनी  नैनीताल के उत्तरी भाग अल्मोड़ा तथा पिथोरा में बोली जाती है। कुमाउनी पर राजरथानी का  प्रभाव है। कुमाउनी की सीमाओं पर गढ़वाली, तिब्बती नेपाली और बोली जाती है।  गंगोला, दानपुरिया, शोरली तथा जोहारी आदि कुमाउनी की बोलियां है। कुमाउंनो में पिछले  सौ वर्षों का साहित्य मिलता है।

b.गढ़वाली

गढ़वाली और उसके आसपास टेहरी, उत्तरकाशी देहरादून  के उत्तरी भाग में बोली जाती है। श्रीनगरिया, राठी,  नागपुरिया, सलानी और टेहरी आदि  गढ़वाली की उपबोलियाँ है। श्रीनगरिआ गढवाली का परिनिष्ठित रूप है। गढ़वाली में काफी मात्रा में लोकसाहित्य मिलता है । गढ़वाली की नगरी लिपि है।

 

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HINDI GRAMMER : हिंदी व्याकरण 

1- भाषा की ध्वनि व्यवस्था

२। हिंदी में वाक्य व्यवस्था 

३। हिंदी पदबंध

४। कारक

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